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शनिवार, सितंबर 20, 2014

चन्दूमल और उनका ठेला


सड़े आम हैं, पका है केला,
कच्चे सेब का लगा है मेला।
फीकी नाशपाती, खट्टेअंगूर,
खाए न इन्हे कोई लंगूर।।

ठेले पर सब रखकर फल,
चले बाजार को चन्दूमल।
फटी है टोपी, बिखरे बाल,
चन्दूमल, पूरे कंगाल।।

मैली कमीज, पीली बनियान,
चप्पलों में हो रही तानातान।
टेढ़े दांत और तिरछी चाल,
गर्मी से हैं हाल बेहाल।।

गलियों में लग रही हैं हाँक,
सब जन करते झांकाझांक।
रोक रोक कर भाव जो पूछें,
चन्दूमल तो अकड़ें मूछें।।

दिन दिन भर गलियों में घूमें,
साँझ भई तो घर पर झूमें।
रोज निकलना, रोज ही आना,
जीवन का यह ताना बाना।।

एक समय था जीवन का वह, छूट गया कहीं लगता पीछे,
धुंधली सी बस याद बची है, खत्म हुआ जल अब कहूँ सींचें।
जीवन भरा था आशाओं से, चहुँ ओर था छाया मेला,
आज तो बस बचा है भैया, चन्दूमल और उनका ठेला।।

रविवार, सितंबर 22, 2013

अर्थ और अनर्थ

मेरी माँ कहा करती थी चिंता और चिता में सिर्फ एक बिंदु का ही फर्क है। मतलब ये कि अर्थ का अनर्थ होने में ज्यादा देर नहीं लगती अगर सही शब्दों का इस्तेमाल न किया जाये तो। अमरीकन लेखक मार्क ट्वेन ने भी कहा है - " स्वास्थ्य सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ते समय सावधानी बरतें , एक गलत छपाई से आप मर सकते हैं "। वैसे अंग्रेजी फिल्म "Into The Wild" में फिल्म का नायक अकेले अलास्का के जंगल में रहते हुए एक जहरीले पौधे को सुरक्षित समझ खा लेता है और मर जाता है। और भी कई उदाहरण ढूंढे जा सकते हैं। 

खैर, और ज्यादा चूं चपड़ किये बिना मुद्दे पर आते हैं। यूंकी इस चिट्ठे पर कई गैर हिंदी भाषी भी आते हैं इसलिए उनकी सुविधा के लिए मैं चिट्ठे पर गूगल का अनुवादक लगा रहा था। लगाने के बाद जाँच पड़ताल के लिए मैंने एक टेस्ट किया - चिट्ठे का अंग्रेजी में अनुवाद कर, परिणाम देखिये -


पोस्ट का जो अनुवाद हुआ वो छोड़िये, चिप्पियों का तो सत्यानाश कर दिया गूगल ने। "यूँ ही" नामक निश्छल चिप्पी का बड़ा ही बेहूदा अनुवाद किया है "Fuckin"! वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओँ में भी ऐसा ही भद्दा अनुवाद किया है। क्या सोचती होगी विश्व की जनता - हम हिंदुस्तानी कैसे गंदे विषयों पर लिखते हैं। 

छि ! आज समझ आया कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देश अपने नागरिकों को क्यों हमारे देश में यात्रा करने के विरुद्ध सलाह देते हैं। सब गूगल का ही दोष है! सोच रहा हूँ देशवासियों की तरफ से मानहानि का दावा ठोक दूं। 

वैसे अगर आपकी सतयुगी आत्मा को इसका अर्थ ज्ञात न हो तो यहाँ क्लिक करें। 

सोमवार, सितंबर 09, 2013

हैप्पी गणेश चतुर्थी - २

आज करीब पाँच साल बाद फिर, मेरे मित्र गणेश चतुर्थी के दिन दनदनाते हुए मेरे घर के अन्दर आये। पिछली बार की तरह इस बार भी कुछ बडबडाते हुए चक्कर काटने लगे। पूर्व अनुभव होने के कारण इस बार हमने पहले ही लड्डू, बर्फी और समोसे की प्लेट उनके आगे कर दी। कॉफ़ी के साथ उनको अन्दर गटकने का इंतजार किया। फिर कहा - "हैप्पी गणेश चतुर्थी "

इस बार वे मुस्कुराने लगे। बोले, "यार तुम तो सही मजे ले रहे हो हमारे" । मैंने कहा, "नहीं भाई ऐसी कोई बात नहीं। त्योहार तो होते ही हैं आपसी सदभाव को बढ़ावा देने के लिए। अपने परिवार, मित्रों और इष्टजनो से मिलने और खुशियाँ बाँटने के लिए। यही तो हमारे देश और धर्म की परंपरा है ..…" 

"बस यार", मेरा वाक्य समाप्त होने के पहले ही उन्होंने काट दिया। "परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन का पाठ सफ़ेद दाढ़ी वाले बुजुर्गों को सुनाना। अभी इन सब चीज़ों को सुनने की शक्ति नहीं है मुझमें। तुम बस तकिया इधर सरकाओ ", उन्होंने तख़्त पर लगभग लुढ़कते हुए कहा।

"अच्छा चलो छोड़ो, तुम ये रसगुल्ले चखो, कल ही एक मित्र कोलकाता से लाये हैं ", मैंने तकिया और रसगुल्ले की प्लेट दोनों आगे कर दिए।


"अमाँ क्या बतायें यार, वही मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। पिछले पांच सालों से वही रोना है। गणपति बप्पा के नाम पर पेड शोरगुल। " नियति के अधीन हो चुके इंसान की तरह वे बोले।

"अरे नहीं यार काफी बदलाव आये हैं अब, ग्रीन इकोसिस्टम को मद्देनज़र रखते हुए गणेशजी की प्रतिमा अब मिटटी से बनायी जाती है, कोई केमिकल रंग या आर्टिफिशियल पदार्थ का इस्तेमाल नहीं किया जाता। " हमने तीर छोड़ा।

" अरे आग लगे वो इंडियन आइडल जूनियर को - सब माँ बाप अपने बच्चे को लता मंगेशकर का अगला अवतार बनाने पर तुले हैं। अब आज की ही लो - आरती वगैरह ख़त्म होने के बाद माता पिता अपने सुपुत्र और सुपुत्रियों को माइक पकड़ा देते हैं और वो रियाज़ करना शुरू। बच्चे भी ऐसे नामाकूल - माइक को मुँह के अन्दर घुसेड ऊँचे राग अलापना शुरू ! बच्चों का ख़तम हुआ तो आंटियां क्लासिकल हिंदुस्तानी और कर्नाटिक संगीत पर गला फाड़ना लगती हैं। गणेश जी का बस चले तो नरसिम्हा की तरह अवतार लेकर, प्रतिमा फाड़ बाहर निकलें और अपनी सूंड से लपेट कर माइक के टुकड़े टुकड़े कर दें। "

"अरे नहीं यार बच्चे हैं ", हमने कहा।

"तुम नहीं समझोगे यार", वे बोले। "मैं तो सोच रहा हूँ कि बच्चों की आवाज़ रिकॉर्ड कर रख ली जाए। रोज शाम को बजाऊंगा तो कम से कम घर के मच्छर भागने के काम आएगा।"

ठहाका लगाते हुए हमने टीवी का रिमोट उनके हाथ में दिया और कहा लो तुम ताजा खबरें सुनो। अरे नहीं, यूँ ही ,ऐसे ही, खामखाँ और कुछ ना नुकुर करने के बाद उन्होंने रिमोट हाथ में लिया और तकिया पीछे लगाये तख़्त पे लधर गए। कुछ देर बाद उनके खर्राटों की वजह से मेरा सोना दुर्भर था। 

रविवार, अगस्त 04, 2013

दास्ताँ-ए-कॉमेडी

किन्ही जनाब ने कहा है - "आप किसी मुल्क के किरदार के बारे में अंदाज़ा लगाना चाहते हैं तो यह देखिये कि उस मुल्क के लोग किन चीज़ों पर हँसते हैं"

आज के ज़माने में आपको अगर अंदाज़ा लगाना है तो आपको किसी दूर मुल्क जाने की तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं है। सारी कायनात का इल्म आपकी मुट्ठी में हो सकता है बस जरा अँगुलियों को टपटपाने की हरकत करें! वैसे जरा अपने दामन पर नज़र डालें और देखें कि कॉमेडी के नाम पर क्या परोसा जा रहा है। लोग ठहाके मार हँस रहे है मुझे क्यूँ शर्मसार महसूस हो रहा है ये फिल्में और टीवी सीरियल देखकर?


मुनासिब शेर अर्ज है -

ख्वाहिश ए क़ल्ब है कि आज जी भर कर हँस लें
इन पर तो आसूँ भी बहाना ज़ाया है यारों।

मालूम है कि अभी नाउम्मीदी का माहौल है चारों तरफ,
पर क्या अब हँस भी नहीं सकते इन शोशों के बिना?

मुतब्बस्सिम है जहाँ ये तमाशा नज़र कर
अपनी तो ख़ुशी ने भी ख़ुदकुशी कर ली यारों।

Image Courtesy - Wikipedia (for non-profit use on the blog)


मंगलवार, जुलाई 27, 2010

३ इडियट्स

३ इडियट्स फिल्म बौलीवुड की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म है। ४५ करोड़ के बजट पर बनी यह फिल्म दुनिया भर में ४७० करोड़ रुपये की कमाई कर चुकी है। ऐसा करके आमिर खान ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सिनेमा दर्शकों की मनोवृति को वो कितनी अच्छी तरह समझ सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी इशारा किया कि आखिर असली इडियटस कौन हैं।


एक तरफ शाहरुख़ खान फिर से अपने हकले अवतार के साथ "माई नेम इज खान" जैसी बेहूदा फिल्म बना रहे हैं दूसरी तरफ अभिषेक बच्चन मुंह पर राख और मिटटी पोत,रावण बन अपनी ही बीवी का अपहरण कर खुद ही दिग्भ्रमित हैं। सैफ अली खान को "आई लव माई गर्लफ्रेंड" कहने से फुर्सत नहीं है। अमिताभ जी की उम्र काफी हो चुकी है - फिर भी वे अपने पोते की उम्र के लड़कों के साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं। सलमान खान तो खैर कंधे चौड़े किये अपनी ही टशन में रहते हैं,उन्हें बस यही डर है कि केटरीना रणबीर के साथ न भाग जाएँ। अर्जुन रामपाल को यह भ्रम हो गया है कि "रॉक ऑन" के बाद आख़िरकार वे एक अच्छे अभिनेता बन चुके हैं - यह आने वाले समय में जनता के लिए हानिकारक हो सकता है।


पिछले हफ्ते २५ जुलाई को यह फिल्म सोनी टीवी पर दिखाई गयी। ऐसा होने के बाद इस फिल्म ने एक रिकोर्ड और तोडा - टीवी पर सबसे ज्यादा कमाई करने का। इस फिल्म के ब्रेक के बीच में दिखाए जाने वाले विज्ञापन को २.२ लाख/सेकण्ड की दर से बेचा गया। इस फिल्म के टेलीकास्ट होने के २४ घंटे के अन्दर सोशिअल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर इसके लाइक्स ने एक छलांग लगे। यह है सोशिअल नेटवर्किंग का बढ़ता हुआ असर!

शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

दास्ताँ ऐ जायका

मुझे खाना बनाना पसंद है। वैसे सही कहा जाये तो खाना बनाना नहीं वरन खाना बनाते हुए प्रयोग करना पसंद है। एक दिन कहीं पढ़ा कि सब्जी में पड़ने वाले मसाले प्राकृतिक होने के कारण उन्हें पकाना नहीं चाहिए, सिर्फ ऊपर से डालना चाहिए। उस रात बनी सब्जी कूड़ेदान में दो दिन तक सड़ती रही। एक दिन गरम दूध में केले डाल दिए तो दूध फट गया। कभी दही, कभी नींबू, कभी अचार मसाला डाल कर सब्जी को ख़राब किया। अनुसंधान के नाम पर कई बार खाने में तला लगा।

बारिश के मौसम में चाय-पकोड़े खाने के लालच में पकोड़े तेल में जलाकर काले किये और लेमन टी बनाने के चक्कर में फटे दूध की चाय बनाई। दीवाली में पटाखे तो सभी फोड़ते हैं मगर मैंने तेल भरी कढ़ाई में समोसे फोड़े। दक्षिण भारतीय पाक शैली से प्रभावित हो एक रविवार डोसा मसाला पावडर खरीदा तो पूरी छुट्टी उस तवे को साफ़ करने में निकली, भूखे पेट रहे सो अलग। कभी ज्यादा पानी से चावल की खीर बन गयी तो कभी कम पानी की वजह से कुकर फटते - फटते बचा। ऑस्ट्रेलिया के मानचित्र का चिंतन करते हुए बनाई गयी रोटी अफ्रीका का अनुसरण करने लगी। कच्चे पपीते की सब्जी खाने के बाद एक हफ्ते पेट दर्द रहा। मगर हम भी हार मानने वालों में से कहाँ थे!



तय हुआ कि टीवी पर "कुकरी शो" देखे जाएँ। क्या पता चौपिंग पैड पर सर रगड़कर अपनी जड़मति भी सुजान हो जाए? मगर आजकल टीवी पर कुकरी कम और खुखरी शो ज्यादा लोकप्रिय हैं। जैसे तैसे संजीव कपूर के शो खाना खज़ाना को ढूँढा गया। एक पल के लिए लगा कि खाना बनाना कितना आसान है।

देखिये कितने सुन्दर चाइना की तश्तरियों में सलीके से छल्लेदार सब्जियां काट कर रखी हैं। छोटे छोटे प्यालों में जायफल, दालचीनी, इलाइची, जाफरानी केसर, चक्र फूल और न जाने कौन - कौन से अजूबे मोहक पदार्थ रखे हुए हैं। दूसरी तरफ चीनी मिटटी के सफ़ेद कटोरों में नमक, हल्दी, मिर्च, धनिया, हींग, अदरक और लहसुन भी आत्मसंतुष्टि से भरे हुए हैं। जैतून का तेल सुराही नुमा जग में बैठा बाकी सब को यूँ देख रहा है जैसी बाढ़ ग्रस्त इलाके को हेलीकाप्टर पर बैठा मंत्री। सारे बर्तन एकदम साफ़ सुथरे और चमकते हुए, जैसे १५ अगस्त की प्रभात फेरी के लिए तैयार स्कूल के बच्चे।

ऐसा लगता है जैसे बोरीवली में फिल्माए जा रहे एक सीन से कैमरा एक पल के लिए स्विट्ज़रलैंड की हसीन वादियों में पहुँच गया हो। सब कुछ इतना सरल, सहज, सुन्दर और सुगम। बस सब्जियां कटी हों, तेल गरम हो, मसाले पिसे हों - सब्जी डालो और पकाओ - न सब्जी काटने की समस्या, न बर्तन धोने का टेंशन! मन हुआ कि ऐसे ही किसी टीवी शो में भर्ती हुआ जाये, इसी बहाने रोज अच्छे पकवान खाने को मिलेंगे।

खैर लौट के बुद्धू घर को आये। समझ में आया कि यह अपने बस का रोग नहीं - जिस का काम उसी को साजे, और करे तो डंडा बाजे। उस दिन से आज तक अपनी पाक प्रतिभा मैगी बनाने तक ही सीमित है।

चित्र साभार : विकिपीडिया

रविवार, मई 16, 2010

जवाबी हलचल

हाल ही में आईपीएल के निलंबित आयुक्त और मोदीनगर के युवराज ललित कुमार मोदी ने बीसीसीआई के कारण बताओ नोटिस का जवाब दिया। उनकी ट्वीट के अनुसार १५,००० पन्नों का ये जवाब छह डब्बों में भरकर सौंपा गया। बीसीसीआई के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी रत्नाकर शेट्टी, जिन्होंने यह 'जवाब' ग्रहण किया, के अनुसार सभी सम्बंधित व्यक्तियों को इसकी एक प्रति प्रदान की जाएगी।

यह पूछे जाने पर कि इस बकासुरीय उत्तर को आत्मसात करने में काफी समय लगेगा, उनके वकील ने चुटकी लेते हुए कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि बीसीसीआई प्रमुख श्री शशांक मनोहर स्वयं एक वकील हैं जो एक मिनट में एक हज़ार पन्ने पढ़ लेते हैं। मोदी के वकील ने कहा कि उन्हें पूरा यकीन है कि श्रीमान मोदी के विरुद्ध लगाये गए सारे आरोप निराधार हैं और शीघ्रातिशीघ्र उन्हें पुनः स्थापित किया जायेगा।


ऐसा न होने पर उन्होंने एक और 'जवाब' भेजने की धमकी दी - इस बार ४५,००० पन्नों का। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अगली बार भी यह प्रलेख बीसीसीआई प्रमुख से ही पढ़वाया जायेगा। यह खबर पढ़ते ही शशांक मनोहर ने अगली सुबह एक प्रेस कान्फेरेंस बुला कर इस्तीफ़ा देने की धमकी दे दी। उनके अनुसार उनके वकील होने का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रेस कान्फेरेंस के दौरान उन्होंने कहा कि मोदी को हटाने में अरुण जेटली का हाथ था और चूँकि वे सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं इसलिए इन दस्तावेजों को पढने का दायित्व भी उनका है। ४५,००० पन्नों का जवाब आने की स्थिति में उन्होंने विदर्भ क्रिकेट असोसीएशन में वापस जाने की इच्छा जाहिर की।

एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक के युवा और जुझारू रिपोर्टर ने इस सवाल को श्री जेटली के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने देश में चल रही 'हीट वेव' का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे भीमशाली गट्ठों को तैयार करने में न जाने कितने पेड़ों को हलकान किया गया होगा। उन्होंने इन पुलिंदों को जनविरोधी करार देते हुए आम जनता से इसके विरुद्ध आवाज उठाने की हिमायत की। उनका कहना था की उनकी पार्टी इस मामले में राष्ट्र व्यापी आन्दोलन छेड़ेगी। उन्होंने अपने न्यायिक अनुभव का परिचय देते हुआ कहा कि वे इस मामले में संवेधानिक संशोधन लाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। १,००० पृष्ठों से ऊपर के दस्तावेजों के प्रकाशित होने की स्थिति में राष्ट्रपति की स्वीकृति परिहार्य होगी - ऐसा बिल वे संसद के ग्रीष्मकालीन सत्र में लायेंगे।

इसी दौरान निलंबित मंत्री श्री शशि थरूर का कहना है कि मोदी को बहाल किया जाना एक गलत उदहारण पेश करेगा। उन्होंने कहा केंद्र में मंत्री होने का उन्होंने कोई लाभ नहीं उठाया है - उल्टा उन्हें होटल से बाहर निकला गया और 'कैटल क्लास' में सफ़र करना पड़ा। जबकि दूसरी ओर मोदी अपने १३ लाख रूपये प्रति घंटे किराये वाले विमान का खर्चा भी आईपीएल से उठवा रहे हैं। यह सरासर नाइंसाफी है।

बुधवार, सितंबर 03, 2008

हैप्पी गणेश चतुर्थी!

मैं दिन भर के काम पूरे कर बैठा ही था कि अचानक मेरे एक मित्र दनदनाते हुए घर के अन्दर आए। हाव भाव कुछ अच्छे प्रतीत नही हो रहे थे, कुछ बडबडा भी रहे थे मन ही मन शायद। आते ही कमरे में चक्कर काटने लगे। मैंने थाह लेने के लिए कहा, "हैप्पी गणेश चतुर्थी"! बस फ़िर क्या था उनके सब्र का बाँध टूट पड़ा!

"अजीब बदतमीजी है ! मतलब गुंडागर्दी है क्या? कुछ भी करेंगे?", एकदम से दो -तीन सवाल उन्होंने दाग दिए। मेरे द्वारा दिए गए पानी के एक ग्लास को गटक कर थोड़ा नरम पड़े। "यह लोग भी न, गणेश चतुर्थी के बहाने बस कुछ भी करना शुरू कर देते हैं!"

"अरे क्या हुआ कुछ खुल कर बताइए न ?" मैंने सहानुभूति के भाव चेहरे पर लाकर पूछा।

"अरे यार क्या बताऊँ? सुबह ६ बजे से फुल वोल्यूम में गाने लगा देते हैं। वह भी अध्यात्म रस से भरपूर भक्ति गीत नही - बल्कि हिमेश रेशमिया छाप, कव्वाली टाइप गाने। गाने के बोल कम और छः फुटिया स्पीकर से निकली हुई बीट्स ज्यादा सुनाई देती हैं। सुबह झक मारकर उठा और दूध लेने के लिए नीचे गया तो देखा कि सामने सड़क खुदी हुई है! एक ही गली में बमुश्किल २० मीटर की दूरी पर चार पंडाल छापे हुए हैं। अन्दर "गणपति बप्पा" शान से बैठे हुए 'मोनालिसा स्माइल' दे रहे हैं। मालुम होता था मानो हमारी हालत पर ही तिरस्कार भरी दृष्टि हो!"


"अरे यह तो हर साल का खेल है - कभी दुर्गा पूजा, कभी गणेश चतुर्थी तो कभी और कुछ। ", कहकर हमने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए।

"अजी अब क्या बताएं आपको, गली के सारे निकम्मे लौंडों का किया धरा है ये सब। दो हफ्ते पहले ही कुछ मुस्टंडे आए थे चंदा मांगने।" उन्होंने फुंफकार मार कर कहा। "और हफ्ते भर बाद देखियेगा यही "गणपति बप्पा" कहीं गंदे पानी में फांके मार रहे होंगे!", उनकी बातों में कटाक्ष का भारी वजन था।

"जी हाँ मुझे भी कल कुछ अदन्नी से बच्चे एक रसीद पुस्तिका लिए हुए मिल गए थे गली के मोड़ पे। गणपति के लिए चंदा मांग रहे थे - बड़ी मुश्किल से टरकाया मैंने!", हम भी दांव पर दांव मार रहे थे।

"अब क्या कहें बमुश्किल पिछले महीने ही नगरपालिका वालों ने सड़क की मरम्मत करवाई थी। और अभी तो बरसात भी पूरी तरह नही ढली है। झुमरी तल्लैया का अगला अवतरण यहीं होने वाला है।", वो बेधडक चालू थे। "अभी शाम को थककर घर आया हूँ तो वही रात्री-गान का 'डेली डोज'। मतलब आज की रात को जगराता?"

"Religion is the opium of masses" और "आजकल का भौतिकवादी समाज" ऐसे कुछ मार्क्सवादी विचार हमने भी ठेल दिए। अब वार्तालाप में मजा सा आने लगा था।

मगर वह तो पूरी तरह से बिदके हुए थे। "अजी साहब, कोई इन भले लोगों को बताये - परमात्मा ने रात्रि विश्राम के लिए बनाई है ; जिसको 'राखी सावंत नैट' मनानी हो वो डांस बार में जाए!"

हमने ठहाके के साथ मिठाई की तश्तरी उनकी तरफ़ सरकाई। दो -तीन कदाचित स्थूल लड्डुओं और निर्बल बर्फियों को निपटाने के बाद वो कुछ ठंडे पड़े। "अच्छा आपका बिस्तर यही लगवा देते हैं, आज रात तो आराम कर लीजिये!", यह प्रस्ताव उन्हें संयत कर गया।

"अजी आज की रात तो कट जायेगी मगर अभी तो विसर्जन में दस दिन बाकी हैं, तब तक तो हमारा गोभी चूरमा बन जायेगा।" ऐसे कहते हुए उन्होंने चद्दर मुंह पर ले ली।

Image Credits: Wikipedia

रविवार, अप्रैल 27, 2008

ड्रामा - ऐ - IPL!

आजकल IPL काफ़ी शोरगुल मचा रहा है। इतना शोर कि उसकी गूँज सदन में भी सुनाई दे रही है। अमरीकन नचइये के भड़कीले कपडों को लेकर बवाल मचा हुआ है। आख़िर वह कैसे इतने छुटले कपड़े पहन कर नाच सकती हैं? यह तो अन्याय है - अब हमारे बौलीवुड की अभिनेत्रियों का क्या होगा? आख़िर कुछ दिन पहले ही करीना ने टशन में आकर इतना "वेट लूज" किया है! और ये फिरंगी लौंडियाँ बीच में आकर हमारी राखी सावन्तों के पेट पे लात मार रही हैं!

और ये क्या - लो जी श्रीसंत तो रो पड़े! आख़िर हुआ क्या ? भज्जी ने चमाट रसीद कर दिखा दिया कि पंजाब की टीम में न होने से कुछ नही होता - असली पंजाब के पुत्तर वही हैं। अब या तो श्रीसंत ने भी मर्द बनकर भज्जी को चम्टिया देना था या फ़िर चुपचाप सहन कर लेना चाहिए था। मगर पहले तो १०,००० लोगों के सामने प्रसाद पाया और फ़िर करोड़ों के सामने रो पड़े। अब हिंदुस्तान की टीम ऑस्ट्रेलिया जायेगी तो क्या कहेंगे वह लोग ?




वैसे विश्वसनीय सूत्रों का यह कहना है कि प्रीटी जिंटा से "जप्पी" न प्राप्त होने की वजह से वह रो पड़े। अब ये हाल अपनी "यंगिस्तान" की जेनरेशन के आइकन का है तो फ़िर हो गया कल्याण !

खैर, मैं तहे दिल से आभारी हूँ IPL का - मनोरंजन भरे ड्रामे के लिए! अगला "मैच" भज्जी और शोएब के बीच में होना चाहिए। वैसे साइमंड्स भी इशांत शर्मा के साथ बौक्सिंग मैच का इरादा जता चुके हैं - तो हो जाए SETMAX पे इन्टरटेन्मेन्ट अनलिमिटेड!

सोमवार, अप्रैल 21, 2008

हाउ टू बी अ सोशियालायिट

Socialite - A socialite is a person (male or female, but more often used for a woman) of social prominence who spends significant resources entertaining and being entertained but is not (at least in the early 20th century heyday of socialites) a professional entertainer. A socialite is usually a member of the upper class or aristocracy with their social movements categorized in high-society magazines. - from Wikipedia.

मुझे पब्लिक ने कहा कि मैं सोशियल नहीं हूँ (इसका मतलब एंटी - सोशियल से न जोडा जाए )। घर पे गया तो पिताजी बोले ,"बेटा कुछ सोशियल बनो" - । "मुझे सोशियालिस्म से कुछ ख़ास लगाव नही है"- मैंने ऐसा टंग-इन-चीक कमेन्ट दिया तो वह आँखे दिखाने लगे। अब पिताजी को निबटा के साँस भरी ही थी कि फ्रेंड्स ने बिगुल बजा दिया - "अबे कैसा है तू ?", मैंने कहा, "मैं ऐसा ही हूँ"। काफ़ी समय तक उनको इग्नोर करने के आजकल मैं सोशियल बनने की कोशिश कर रहा हूँ।

वैसे सोशियलायिट होना भी एक कला ही है। इसके निदान के लिए "लाख दुखों की एक दवा" विकिपेडिया पर खोजा गया तो पता चला कि इसके लिए कुछ स्टेप्स हैं।

1. अच्छा नाम होना चाहिए। जैसे तारापोरवाला , सिंघानिया, मल्होत्रा, गोदरेज आदि अनादी। ज्यादा चूल हो तो क-अक्षरधारी किसी भी प्रदूषित धारावाहिक का अवलोकन किया जा सकता है - मगर अपने रिस्क पे। अब "लल्लन पाण्डेय" जैसे चिरकुटिया नाम का प्रयोग तो बिल्कुल ही अनफ़ैशनेबल है - अपने पैर पर कुल्हाडी मारने जैसा। हाँ, मिसेज पूनावाला एकदम "इन" नाम है।
2. लूक्स ऐसी हों कि लगे मानों राजघराने के वारिस आज अनाथालय में बक्शीश देने आए हों। यह न हो कि नाम हो लिल्लेटे दुबे और शकल हो हैदराबाद के लाद बाजार में चूडियाँ बेचने वाले सारखी।
3. आपका ग्रेजुएशन सही सब्जेक्ट से हो - जैसे इंग्लिश या फ्रेंच लिटरेचर , रोमन कला और साहित्य, साइकोलोजी या इकोनोमिक्स। हिन्दी साहित्य या राजनीती विज्ञान जैसे आत्मघाती शब्दों का प्रयोग तो कतई न करें। देहरादून या नैनीताल के बोर्डिंग स्कूलों में बचपन निकला हो तो सोने पे सुहागा!
4. आप कई सारे ट्रस्ट या कमिटी के सदस्य हों तो अच्छा होगा। हॉस्पिटल, चेरिटी, समाज के निम्न (गिरे हुए) वर्गों से संबंधित कुछ मिल जाए तो इमोशन का तड़का भी आ जाए। वैसे आजकल HIV - AIDS का बाज़ार भी काफ़ी गरम है।पूजनीय श्रीमती राधा बाई गंगवाल धर्मशाला का जिक्र नुकसानदायक हो सकता है।
5. शौक ऐसे पालें मानो नवाब के जाने हों! गोल्फ, पोलो,टेनिस, हौर्स रायडिंग, फार्मूला वन जैसे खेलो में रूचि रखें।गोल्फ क्लब की सदस्यता लें - किरकिट, हॉकी, कब्बडी जैसे सड़कछाप खेलों से दूर ही रहे। हाँ, IPL में रूचि दिखा सकते हैं।


6. गाल को चूमना सीखें - मगर भडैत तरीके से नहीं - बस हवा में एक किस। लंबा वाला सेशन पार्टी के बाद कार में पूरा कर सकते हैं।
7. होटल में समय बिताएं। एक रात के लिए कमरा लेकर दोस्तों को पार्टी पर बुलाएं - कह सकते हैं कि घर पे आप "बोर" हो गए थे - या फ़िर "यू नीडेड अ ब्रेक"। उपरोक्त उपाय प्रायतः काफी सफल पाया गया है।
8. चमकने वाले कपड़े पहने, जितनी चमक उतना असर ! लंदन और फ्रांस का लेबल हो तो बात बन जाए।
9. चेहरे पे सदा एक मुस्कान बनी रही - कैटरिना कैफ जैसी -(कमबख्त हर सीन में एक ही चेहरा ले के आ जातीहै)। एकदम ग्रेसफुल और नॉन-चलेंट रहें - दीन दुनिया से अविचलित। भले ही आपके सामने अभिषेक बच्चन खड़ा हो - यूं बिहेव करें कि मानों आपके लिए ये रोज की बात हो!
10. एंड लास्ट बात नेवर द लीस्ट - बात करने का लहजा सीखें। "यू लुक बियुटिफुल/गोर्जियस " के बजाय " यूलुक डिवायिन / डिवास्टेटिन्ग " बेहतर है। आप जो भी कहें वह एक्साइटिन्ग होना चाहिए - आम घरेलु काम को सजा -धजाकर बताएं।

अब मुझ जैसे देहाती - अनरिफ़ाइन्ड का न जाने क्या होगा मगर आप ही शायद इन तरीकों से लाभ उठा पाएं - इसी से मेरा लेख सार्थक हो जाएगा।

नोट - आज के इस भाषाई डायरिया के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। मगर क्या करूँ एक प्रोस्पेक्टिव सोशियालायिट को इसी भाषा का प्रयोग मान्य है!

शनिवार, जनवरी 12, 2008

एक सुबह टीवी के साथ ...

कुछ दिन पहले की ही बात है, ठीक तारीख तो याद नहीं मगर वह बेमतलब है। कुछ औसत सा ही दिन था। सूरज आज भी पश्चिम से उगा था। मगर कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था। अरे हाँ, इतनी शांति जो थी ! सुबह - सुबह नरकपालिका वाले आकर गली के सारे कुत्तों को गाड़ी में उठा कर ले गए थे। तभी मकान मालिक ने दरवाज़े पे दस्तक देकर किराये की फरमाईश कर दी। उसको निपटाते ही केबल, अखबार और इंटरनेट का बिल लेने वाले भी आ धमके। काम वाली बाई ने भी मौका देखते ही बहती गंगा में हाथ धो लिए। अपने आप को इतने सारे लोगों के प्रति कर्ज़दार पाकर मैं अपराध भाव से ग्रस्त हो चुका था।

वह ऐसा ही एक दिन था इन सब की मार से त्रस्त मैं आंखें फाड़ के टीवी के सामने बैठा था। पहले कतार से न्यूज़ चैनलों ने अपने दर्शन दिए। हर चैनल हमें वक़्त से भी तेज चलने की सलाह दे रह था। अब यह बताना फिजूल है की यह निर्वाण सिर्फ उनके चैनल के साथ ही संभव था।


पिछले पखवाडे में काफी कुछ घट चुका था। मोदित्व की गुजरात विजय, बेनजीर की सनसनीखेज हत्या, गोवा में सेज , राखी सावंत का नाच, सिडनी का मंकी - क्रिकेट वगैरह - वगैरह। कहने का सार यह की आज न्यूज़ चैनलों के पास ख़बरों की कमी न थी।

आज स्टार न्यूज़ , आजतक और इंडिया टीवी के बीच में बेहूदा खबरों को ब्रेकिंग न्यूज़ बनने की होड़ न थी। यहाँ तक कि देर रात को टीवी सेट पर आकर अंगुली लहराते हुए एक दढियल सज्जन भी आज गुम थे !


किसी तरह इन सुब को निबटा के हम आगे बढे तो कुछ "घरेलु" चैनलों ने अपना रोना मचाया हुआ था। गृह कलेश, षड्यंत्र, छल - कपट, पर स्त्रीगमन, घरेलु ईर्ष्या जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस चल रही थी। भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने का दंभ भरते हुए कुछ स्त्रियाँ नौ गज की साड़ी ,भारी शृंगार, ऊँची संडल, छोटे ब्लाउज़ और ग्लिसरीन उत्पत्त अश्रु नेत्रों में ग्रहण किये हुए एक जज्बाती बहस में मशगूल थी। करोडों की बात तो यूं चल रही थी मानों सभी नवाब की जनी रिक्त हुंडी हाथ में लेकर पैदा हुई हों।


खैर आगे बढ़ते ही बाबा रामदेव ने न जाने किस इश्वर उत्पत्त आसन का प्रदर्शन करके अपने पेट की सारी अंतडियो के अप्रत्यक्ष दर्शन करा दिए। देखकर मानों क्यों दिल में मचली सी होने लगी। कुछ अन्य महानुभाव भी इश्वर भक्ति में लिप्त हों - इस संदर्भ में हमें कुछ उपदेश देने के लिए अपना गला खंखार रहे थे कि हम सटक लिए।

आगे के कुछ चैनल हमारे लिए बधिरों की श्रेणी से हैं। इन राहू केतु चैनलों की संख्या २०-२५ के बीच में है जो कि असाधारण रुप से बढ़ सकती है यदि आप दक्षिणी भारत की तरफ प्रस्थान करें। इन चैनलों पर भरमार है पारदर्शी साडी पहने हुई मांसल अभिनेत्रियों और हजारी के फूलों की क्यारी की तरह होंठों से सटी हुई मूछें धारण किये हुए तोंदले अभिनेताओं की। ऐसे महामानव जिनके लिए चित्रकथाओं के नायक की भांति कुछ भी असंभव नही ! चाहे एक हाथ से ट्रेन को रोकना हो, या फिर अंगुली से दीवार में कील ठोकना या फिर बंदूक से निकली हुई गोली को ब्लेड कि सहायता से दो भागों में विभाजित करना।

इन सब चैनलों को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मान हमने एक लंबी छलांग लगाई, धरती पर कदम रखते ही पाया कि दो अति हृष्ट पृष्ट पुरुष एक दुसरे को उठा कर पटक रहे हैं। तभी काले लंगोट वाले ने एक कुर्सी उठा के दुसरे के सिर पे दे मारी । यह देख रिंग के बाहर खड़ी उसकी महिला सह्भागिनी ने नकटी शूर्पनखा की भाँती चीत्कार करते हुए रिंग के अन्दर छलांग लगाई।

यह सब खून खराबा पीछे छोड़ हम डिस्कवरी के गुच्छे पर आ लटके। और बाक़ी पूरा दिन हमने ग्लोबल वार्मिंग से मोजाम्बिक के पर्यावरण पर हो रहे दुष्प्रभाव का अवलोकन करते हुए बिताया।