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शनिवार, सितंबर 20, 2014

चन्दूमल और उनका ठेला


सड़े आम हैं, पका है केला,
कच्चे सेब का लगा है मेला।
फीकी नाशपाती, खट्टेअंगूर,
खाए न इन्हे कोई लंगूर।।

ठेले पर सब रखकर फल,
चले बाजार को चन्दूमल।
फटी है टोपी, बिखरे बाल,
चन्दूमल, पूरे कंगाल।।

मैली कमीज, पीली बनियान,
चप्पलों में हो रही तानातान।
टेढ़े दांत और तिरछी चाल,
गर्मी से हैं हाल बेहाल।।

गलियों में लग रही हैं हाँक,
सब जन करते झांकाझांक।
रोक रोक कर भाव जो पूछें,
चन्दूमल तो अकड़ें मूछें।।

दिन दिन भर गलियों में घूमें,
साँझ भई तो घर पर झूमें।
रोज निकलना, रोज ही आना,
जीवन का यह ताना बाना।।

एक समय था जीवन का वह, छूट गया कहीं लगता पीछे,
धुंधली सी बस याद बची है, खत्म हुआ जल अब कहूँ सींचें।
जीवन भरा था आशाओं से, चहुँ ओर था छाया मेला,
आज तो बस बचा है भैया, चन्दूमल और उनका ठेला।।

रविवार, सितंबर 22, 2013

अर्थ और अनर्थ

मेरी माँ कहा करती थी चिंता और चिता में सिर्फ एक बिंदु का ही फर्क है। मतलब ये कि अर्थ का अनर्थ होने में ज्यादा देर नहीं लगती अगर सही शब्दों का इस्तेमाल न किया जाये तो। अमरीकन लेखक मार्क ट्वेन ने भी कहा है - " स्वास्थ्य सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ते समय सावधानी बरतें , एक गलत छपाई से आप मर सकते हैं "। वैसे अंग्रेजी फिल्म "Into The Wild" में फिल्म का नायक अकेले अलास्का के जंगल में रहते हुए एक जहरीले पौधे को सुरक्षित समझ खा लेता है और मर जाता है। और भी कई उदाहरण ढूंढे जा सकते हैं। 

खैर, और ज्यादा चूं चपड़ किये बिना मुद्दे पर आते हैं। यूंकी इस चिट्ठे पर कई गैर हिंदी भाषी भी आते हैं इसलिए उनकी सुविधा के लिए मैं चिट्ठे पर गूगल का अनुवादक लगा रहा था। लगाने के बाद जाँच पड़ताल के लिए मैंने एक टेस्ट किया - चिट्ठे का अंग्रेजी में अनुवाद कर, परिणाम देखिये -


पोस्ट का जो अनुवाद हुआ वो छोड़िये, चिप्पियों का तो सत्यानाश कर दिया गूगल ने। "यूँ ही" नामक निश्छल चिप्पी का बड़ा ही बेहूदा अनुवाद किया है "Fuckin"! वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओँ में भी ऐसा ही भद्दा अनुवाद किया है। क्या सोचती होगी विश्व की जनता - हम हिंदुस्तानी कैसे गंदे विषयों पर लिखते हैं। 

छि ! आज समझ आया कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देश अपने नागरिकों को क्यों हमारे देश में यात्रा करने के विरुद्ध सलाह देते हैं। सब गूगल का ही दोष है! सोच रहा हूँ देशवासियों की तरफ से मानहानि का दावा ठोक दूं। 

वैसे अगर आपकी सतयुगी आत्मा को इसका अर्थ ज्ञात न हो तो यहाँ क्लिक करें। 

सोमवार, सितंबर 09, 2013

हैप्पी गणेश चतुर्थी - २

आज करीब पाँच साल बाद फिर, मेरे मित्र गणेश चतुर्थी के दिन दनदनाते हुए मेरे घर के अन्दर आये। पिछली बार की तरह इस बार भी कुछ बडबडाते हुए चक्कर काटने लगे। पूर्व अनुभव होने के कारण इस बार हमने पहले ही लड्डू, बर्फी और समोसे की प्लेट उनके आगे कर दी। कॉफ़ी के साथ उनको अन्दर गटकने का इंतजार किया। फिर कहा - "हैप्पी गणेश चतुर्थी "

इस बार वे मुस्कुराने लगे। बोले, "यार तुम तो सही मजे ले रहे हो हमारे" । मैंने कहा, "नहीं भाई ऐसी कोई बात नहीं। त्योहार तो होते ही हैं आपसी सदभाव को बढ़ावा देने के लिए। अपने परिवार, मित्रों और इष्टजनो से मिलने और खुशियाँ बाँटने के लिए। यही तो हमारे देश और धर्म की परंपरा है ..…" 

"बस यार", मेरा वाक्य समाप्त होने के पहले ही उन्होंने काट दिया। "परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन का पाठ सफ़ेद दाढ़ी वाले बुजुर्गों को सुनाना। अभी इन सब चीज़ों को सुनने की शक्ति नहीं है मुझमें। तुम बस तकिया इधर सरकाओ ", उन्होंने तख़्त पर लगभग लुढ़कते हुए कहा।

"अच्छा चलो छोड़ो, तुम ये रसगुल्ले चखो, कल ही एक मित्र कोलकाता से लाये हैं ", मैंने तकिया और रसगुल्ले की प्लेट दोनों आगे कर दिए।


"अमाँ क्या बतायें यार, वही मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। पिछले पांच सालों से वही रोना है। गणपति बप्पा के नाम पर पेड शोरगुल। " नियति के अधीन हो चुके इंसान की तरह वे बोले।

"अरे नहीं यार काफी बदलाव आये हैं अब, ग्रीन इकोसिस्टम को मद्देनज़र रखते हुए गणेशजी की प्रतिमा अब मिटटी से बनायी जाती है, कोई केमिकल रंग या आर्टिफिशियल पदार्थ का इस्तेमाल नहीं किया जाता। " हमने तीर छोड़ा।

" अरे आग लगे वो इंडियन आइडल जूनियर को - सब माँ बाप अपने बच्चे को लता मंगेशकर का अगला अवतार बनाने पर तुले हैं। अब आज की ही लो - आरती वगैरह ख़त्म होने के बाद माता पिता अपने सुपुत्र और सुपुत्रियों को माइक पकड़ा देते हैं और वो रियाज़ करना शुरू। बच्चे भी ऐसे नामाकूल - माइक को मुँह के अन्दर घुसेड ऊँचे राग अलापना शुरू ! बच्चों का ख़तम हुआ तो आंटियां क्लासिकल हिंदुस्तानी और कर्नाटिक संगीत पर गला फाड़ना लगती हैं। गणेश जी का बस चले तो नरसिम्हा की तरह अवतार लेकर, प्रतिमा फाड़ बाहर निकलें और अपनी सूंड से लपेट कर माइक के टुकड़े टुकड़े कर दें। "

"अरे नहीं यार बच्चे हैं ", हमने कहा।

"तुम नहीं समझोगे यार", वे बोले। "मैं तो सोच रहा हूँ कि बच्चों की आवाज़ रिकॉर्ड कर रख ली जाए। रोज शाम को बजाऊंगा तो कम से कम घर के मच्छर भागने के काम आएगा।"

ठहाका लगाते हुए हमने टीवी का रिमोट उनके हाथ में दिया और कहा लो तुम ताजा खबरें सुनो। अरे नहीं, यूँ ही ,ऐसे ही, खामखाँ और कुछ ना नुकुर करने के बाद उन्होंने रिमोट हाथ में लिया और तकिया पीछे लगाये तख़्त पे लधर गए। कुछ देर बाद उनके खर्राटों की वजह से मेरा सोना दुर्भर था। 

सोमवार, मार्च 19, 2012

लूडो

बचपन में बहुत लूडो और सांप सीढ़ी खेला गया है - बड़ा ही सरल, सहज सा खेल. आज कंप्यूटर पर भारी भरकम ग्राफिक वाले खेल खेले जाते हैं - NFS हो या AoE या और कोई. अब तो गति संवेदक खेल भी बाज़ार में आ चुके हैं - जो आपके शरीर की हरकतों को भांप कर उसे स्क्रीन पर परिकल्पित करते हैं.

देखें तो यह प्रचलन खेलों, फिल्मों या किसी भी तकनीक आधारित विषय पर लागू होता है. मूर के सिद्धांत के अनुसार संगणन के हार्डवेयर में उन्नत तकनीकों के प्रयोग की वजह से आज मनुष्य के समक्ष कई विकल्प प्रस्तुत हैं. देखिये त्रासदी यह है कि टाइटैनिक जहाज के डूबने पर बनी फिल्म टाइटैनिक को बनाने में जहाज से ज्यादा पैसा लगा था!


आज के ये विडियो गेम्स कुछ ज्यादा ही यांत्रिक हैं. मानना पड़ेगा कि बहुत उच्च श्रेणी के वैशिष्ठ्य से लबालब है - आपको हैरान कर सकते हैं मगर उनमें कुछ तो कमी है. वह कमी है संयोग की. आप एक बार किसी विडियो गेम को खेल कर देखें - अगली बार आप उसे खेलेंगे तो आप पात्रों की स्थिति और कार्यकलाप का अनुमान लगा सकते हैं. आप कार रेस पर आधारित कोई खेल खेलें और देखें - एक निर्धारित समय पर ही कोई मोड़ या कोई दूसरा वाहन आपके सामने आएगा. आप किसी दूसरे 'Strategy' खेल का भी उदाहरण दे सकते हैं.

इन महंगे विडियो गेम्स के मुकाबले सांप सीढ़ी और लूडो जैसे खेल भले ही रमणीय न हो मगर आपके अंतर्मन को जरुर संतुष्ट करते हैं. आप खेल की परिस्थिति का पूरा अंदाज लगाकर कूटनीति बना लें मगर आपकी अगली चाल का निर्णय पासा फेंकने के बाद ही हो पाता है. प्रारब्ध के इस हस्तक्षेप से खेल में जो अनिश्चितता प्रस्तुत होती है वही खेल का मधुर रस है!

Image Courtesy: Wiki User Micha

मंगलवार, नवंबर 23, 2010

राम और रावण

पूर्वाग्रह मेरे चिंतन में सदा ही शामिल रहा है। न जाने क्यों मगर मैं सदा ही उससे मुग्ध रहा हूँ। मेरी कई प्रविष्टियाँ भी इस प्रसंग पर आधारित हैं। शायद इसलिए कि मेरा मन स्वयं पूर्वाग्रही हो! फ्रोय्डियन विश्लेषण भी इसी तरफ संकेत करता है - अवचेतन मन के विचार लेखनी में उतर आये हैं।

शायद वजह मेरे एक छोटे शहर से आकर एक महानगरीय संस्कृति में सम्मिलित होने की झिझक है। घर से निकलते हुए माता पिता ने कुछ ज्यादा ही मोटे रस्से पैरों में बाँध दिए थे। ये करना - वो नहीं, यहाँ जाना - वहां नहीं, इससे नहीं मिलना, चीज़ें संभल कर रखना वगैरह वगैरह। किसी दूसरे को देख कर पहले से विचार बना लेना, एक आलोचनात्मक रुख अपना लेना यह शायद उन्ही सीखों की देन है। शायद।

मगर क्या यह आचरण उन कुछ निर्धारक संलक्षणों में से नहीं है जो सिर्फ एक मानव का वैशिष्ठ्य है? आखिर सिक्के के दो पहलू ही तो हैं ये - अच्छाई और बुराई। आदि काल से मानव इतिहास पर नजर डालेंगे तो कई उदहारण मिल जायेंगे आपको। फिर मैं क्यों स्पष्टीकरण दूं अपने व्यवहार का?


२००५ में हॉलीवुड में एक फिल्म रिलीज़ हुई थी - Crash। यह फिल्म अमरीका में फैले सामाजिक,जातीय और रंगभेदीय संघर्षों के बारे में है। फिल्म में कई कहानियां सामानांतर चलती हैं जो कहीं न कहीं एक दूसरे से जुडी हुई हैं। कहानी के पात्र गोरे, काले, एशियन, लातिन अमरीकी और ईरानी हैं। मानसिक अंतर्द्वंदों से गुंथी हुई कहानी है ये। एक दूसरे के प्रति पूर्वधारणाओं और कुछ हद तक अज्ञान से उपजे अविश्वास की कहानी।

यह कहानी हमारे देश के किसी भी हिस्से की हो सकती है। बस रंग की जगह वर्ण,गोत्र,भाषा या ने ले ली है। दक्षिण भारतीय लुंगी धारी 'मद्रासी', भांगड़ा की ताल पर नाचते हुए पटियाला पैग गटकता पंजाबी, दिल्ली के 'अर्बन घेटो' में रहने वाला चिंकी, मुंबई महानगर पालिका की दीवार पर गुटके की पिचकारी मारता भैय्या, साल्ट लेक की कॉफ़ी शॉप में बहस करता भद्रलोक, दिल्ली के हाईवे ढाबों पर बर्तन धोता मासूम पहाड़ी बच्चा, रागिनी गुनगुनाते हुए १०० का नोट जेब में ठूंसने वाला हरियाणा पुलिस का सिपाही, रायपुर में बच्चों के लिए मिटटी के खिलौने बेचने वाला कोल, पश्चिमी घाट के किलों पर चढ़कर 'जय भारत' से पहले 'जय महाराष्ट्र' का नारा लगाने वाला मराठी या साथ में रसोइया लेकर चार धाम के दर्शन को जाने वाला शाकाहारी गुजराती।

वही नजर दौड़ाता हूँ तो दिखते हैं कुछ और रूप। सिख जिन्होंने 'अमृत' चखा है, IIT के सूट बूट पहने तमिल प्रोफ़ेसर, गुडगाँव के कॉल सेंटर में काम करते हुए अपनी पहचान खोता मणिपुरी, ट्रैफिक रोककर एक बूढ़े को सड़क पार करवाता दिल्ली पुलिस का सिपाही, सीमा पर देश के लिए गोली खाता मराठी मेजर, नारायणपुर में जवानों का गला काटता कोल, अहमदाबाद में दंगे करता गुजराती, मुंबई के अंडर वर्ल्ड का शार्प शूटर बन बैठा एक मासूम पहाड़ी बच्चा।

कौन है राम और कौन रावण? मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा - सर चकरा रहा है।

चित्र साभार : Francesco Marino

रविवार, मई 16, 2010

जवाबी हलचल

हाल ही में आईपीएल के निलंबित आयुक्त और मोदीनगर के युवराज ललित कुमार मोदी ने बीसीसीआई के कारण बताओ नोटिस का जवाब दिया। उनकी ट्वीट के अनुसार १५,००० पन्नों का ये जवाब छह डब्बों में भरकर सौंपा गया। बीसीसीआई के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी रत्नाकर शेट्टी, जिन्होंने यह 'जवाब' ग्रहण किया, के अनुसार सभी सम्बंधित व्यक्तियों को इसकी एक प्रति प्रदान की जाएगी।

यह पूछे जाने पर कि इस बकासुरीय उत्तर को आत्मसात करने में काफी समय लगेगा, उनके वकील ने चुटकी लेते हुए कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि बीसीसीआई प्रमुख श्री शशांक मनोहर स्वयं एक वकील हैं जो एक मिनट में एक हज़ार पन्ने पढ़ लेते हैं। मोदी के वकील ने कहा कि उन्हें पूरा यकीन है कि श्रीमान मोदी के विरुद्ध लगाये गए सारे आरोप निराधार हैं और शीघ्रातिशीघ्र उन्हें पुनः स्थापित किया जायेगा।


ऐसा न होने पर उन्होंने एक और 'जवाब' भेजने की धमकी दी - इस बार ४५,००० पन्नों का। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अगली बार भी यह प्रलेख बीसीसीआई प्रमुख से ही पढ़वाया जायेगा। यह खबर पढ़ते ही शशांक मनोहर ने अगली सुबह एक प्रेस कान्फेरेंस बुला कर इस्तीफ़ा देने की धमकी दे दी। उनके अनुसार उनके वकील होने का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रेस कान्फेरेंस के दौरान उन्होंने कहा कि मोदी को हटाने में अरुण जेटली का हाथ था और चूँकि वे सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं इसलिए इन दस्तावेजों को पढने का दायित्व भी उनका है। ४५,००० पन्नों का जवाब आने की स्थिति में उन्होंने विदर्भ क्रिकेट असोसीएशन में वापस जाने की इच्छा जाहिर की।

एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक के युवा और जुझारू रिपोर्टर ने इस सवाल को श्री जेटली के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने देश में चल रही 'हीट वेव' का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे भीमशाली गट्ठों को तैयार करने में न जाने कितने पेड़ों को हलकान किया गया होगा। उन्होंने इन पुलिंदों को जनविरोधी करार देते हुए आम जनता से इसके विरुद्ध आवाज उठाने की हिमायत की। उनका कहना था की उनकी पार्टी इस मामले में राष्ट्र व्यापी आन्दोलन छेड़ेगी। उन्होंने अपने न्यायिक अनुभव का परिचय देते हुआ कहा कि वे इस मामले में संवेधानिक संशोधन लाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। १,००० पृष्ठों से ऊपर के दस्तावेजों के प्रकाशित होने की स्थिति में राष्ट्रपति की स्वीकृति परिहार्य होगी - ऐसा बिल वे संसद के ग्रीष्मकालीन सत्र में लायेंगे।

इसी दौरान निलंबित मंत्री श्री शशि थरूर का कहना है कि मोदी को बहाल किया जाना एक गलत उदहारण पेश करेगा। उन्होंने कहा केंद्र में मंत्री होने का उन्होंने कोई लाभ नहीं उठाया है - उल्टा उन्हें होटल से बाहर निकला गया और 'कैटल क्लास' में सफ़र करना पड़ा। जबकि दूसरी ओर मोदी अपने १३ लाख रूपये प्रति घंटे किराये वाले विमान का खर्चा भी आईपीएल से उठवा रहे हैं। यह सरासर नाइंसाफी है।

शनिवार, जून 20, 2009

साईकिल

उसने घर से साइकिल निकली और चल पड़ा। साइकिल के पूरे बदन पर धूल बिछी हुई थी। आजकल शहरों में कितनी धूल है, पता नही कहाँ से आ जाती है। विदेश में तो कहीं धूल नही होती? यहाँ वहां देखो धूल का एक कण भी नही दिखता और अपने ये शहर तो मानो धूल भरी तश्तरी है। जरा सी हवा चली नही कि चहुँ-ओर धूलमधूल। ये लोग पेड़ नही लगाते, घर पर घास का 'लॉन' उगाना प्रतिष्ठा का प्रतीक है, मगर मार्ग-विभाजक पर बिछी हुई घास का पद दमन करने में कोई हर्ज नही। देखा तो पहियों में हवा भी कुछ कम थी। पिछले दो हफ्तों से साइकिल जो न चलायी थी!

साइकिल का हेंडल पकड़ वह बाहर निकला। कल्लू पंक्चर की दुकान रस्ते में ही है - वहीँ हवा भरा लेगा। आगे जाकर एक शार्टकट मार सीधा हवा भरवाई। साइकिल पर कपड़ा मारा तो लगा कहीं से आहें और कहीं से दुआएं आई। स्टैंड पर टिकाकर पहियों को एक दो चक्कर घुमाये, गियर अपनी जगह पर स्थापित किए। आगे खाली सड़क थी - तो चल पड़ा।



शुरुआत में ही गति पकड़ ली, एक आध ऑटोरिक्शा को पीछे किया तो छाती फूल गई। कुछ ही देर में वह एक छुट्टन सी कार के बगल में था -दोनों साथ में - और अभी तो साइकिल पांचवे ही गियर में थी ! एक पल के लिए कार वाले को विश्वास न हुआ - झेंप कर उसने अपनी गति बढाई और धूल का गुबार उड़ाकर आगे निकल गया। मरा हाथी भी भैंस से ऊंचा होता है - भले ही छोटी हो, है तो कार ही !

फिजूल ही कार वाले के अहम् को ललकारा। ढेर सारी धूल फांक कार वह आगे बढ़ा - देखा तो चढाई थी। दो- तीन किलीमीटर तो हो ही गए होंगे - शुरू की गर्मी भी अब हवा हो चुकी थी। श्वसन गति भी बढ़ गई थी - तुंरत गियर डाउन किए, हाँफते हुए उस चढाई को पार किया।

कुछ देर बाद अब साँस सामान्य हो चुकी थी। उसे अपने अन्दर ऊर्जा का एक उमड़ता हुआ स्रोत महसूस हुआ। एक अनोखी खुशी और उन्माद की ऐसी अप्रतिम लहर - शायद इसी को 'Second Wind' कहते हैं।

रविवार, मई 31, 2009

दुनिया की सबसे कठिन भाषा?

मुझे नई भाषाएँ सीखने में रूचि है। कई सज्जनों ने पूछा, "क्यों?"। मन हुआ कि बडबडा दूँ "इन्टेलेक्चुअल क्युरिऔसिटी", मगर इन्टेलेक्चुअल को गटक गया और उगल दिया मात्र "क्युरिऔसिटी"। कई बार मन में प्रश्न उठता है कि "दुनिया की सबसे कठिन भाषा कौनसी है?"। वैसे यह प्रश्न यदि यूपी बोर्ड के छात्रों तो समक्ष रखा जाए तो सर्वसम्मत उत्तर मिलेगा - अंग्रेज़ी। यही देखकर उनके मन में अंग्रेजों के प्रति श्रद्धाभाव और बढ़ जाता है - वहां तो बच्चे भी अंग्रेज़ी बोल लेते हैं और यहाँ मैट्रिक पास होकर भी 'हेलो गुड मॉर्निंग और प्लीज़' से आगे नही बढ़ पाते!


वैसे यह प्रश्न भी बड़ा अजायब है, जिसका उत्तर इस बात पर निर्भर है कि उत्तर देने वाला कौन है! हिन्दीभाषी के लिए पंजाबी सीखना उसी तरह आसान है जैसे पुर्तगाली बोलने वाले के लिए स्पेनिश सीखना।अंग्रेज़ी में एक कहावत है "That's Greek to me" जिसका अपनी सीधी साधी खड़ी हिन्दी में अनुवाद है - "ये बात तो अपने पल्ले न पड़ी, सर के ऊपर से हो ली"। गौरतलब बात यह है कि लगभग हर प्रमुख भाषा में इस कहावत का एक सदृश है। इन उदाहरणों पर एक नजर डालें तो कुछ दिलचस्प चीज़ें दिखाई देंगी। जैसे ब्रितानी लोगों के पल्ले ग्रीक, चीनी और डच भाषाएँ नही पड़ती तो फ्रांसीसियों के पल्ले हिब्रू और जावा। हमारी अपनी हिन्दी अरबों की समझ के बाहर है तो रो़म वासियों के लिए अरबी मंगल गृह पर बोली जाने वाली भाषा है। वैसे पंजाबी में भी कहते हैं " ਕੀ ਮੈਂ ਫਾਰਸੀ ਬੋਲ ਰਿਹੈਂ?" (क्या मैं फ़ारसी बोल रहा हूँ?)

अगर इन भाषाई मुहावरों को एक मानदंड मान कर यदि एक सर्वसम्मत निष्कर्ष निकला जाए तो वह यह होगा कि दुनिया की सबसे कठिन भाषा चीनी है। अब सीखने में सबसे मुश्किल भाषा बोलने वाले ये चीनी लोग किस भाषा को सबसे कठिन समझते हैं ? जंगल के राजा शेर को मात देने वाले को चुनौती देने का माद्दा किसमे है? चीनी भाषा के मुहावरों पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि चिडियों की भाषा ही अगला पायदान है। धन्य हो चीनियों!

रविवार, सितंबर 14, 2008

सिटी बस में दो महिलाएं - भाग दो

बस ने फ़िर से गति पकड़ ली थी। अपनी सफ़लता से उत्साहित होकर वो पुरूष गप्पियाने लगे। बस में बैठे लोग भी इस क्षणिक परिहास को मरुस्थल में जल की बूँद समझ उकता गए कुछ फ़िर से झोंके खाने लगे, तो दूसरों ने अखबार में नज़रें गढा लीं। लड़की भी इसे दैवगति समझ हताश भाव से बस के खंभे को ताकने लगी।

बस अगले स्टाप पर रुकी एक मोटी सी महिला लगी चढी। अधेड़ उम्र, सुनहरी साड़ी, आंखों पर काला धूप का चश्मा, कानों में बड़े रिंग, माथे पर औसत से कुछ बड़ी लाल रंग की बिंदी, कलाईयों में सोने के बड़े कंगन और पैरों में ऊँची हील। हाथों में बड़े थैले जिनमे शायद सेल से खरीदी गई साड़ी और सूट थे।

बस में ऊपर चढ़ने लगी तो दरवाज़े पे कुछ लड़के लटके हुए थे। ये लटकते हुए जीव भी अजीब नस्ल हैं। हर बड़े शहर चाहे दिल्ली हो या बंगलोर, कलकत्ता हो या मुंबई की बसों से लटकते मिल जायेंगे। शायद तेजी से बढती आबादी के सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है ये ! बस चाहे भरी हो या खाली ये जरूर दरवाजे पर लटकेंगे। किसी की नहीं सुनते कंडक्टर बेचारा रोज का कहता हुआ थक जाता है। स्टाप पर बस रुकते ही एक हुजूम आगे बढ़ता है ये लट्क्न्त जीव नीचे उतारते हैं सड़क पर थूकते हुए, आसपास गुजरती हुई लड़कियों को घूरते हैं। भीड़ के ऊपर चढ़ने का इंतजार करते हैं। फ़िर उसी हालत में एक हाथ बस के किसी कोने में फसांकर यूँही लटक जाते हैं। कोई मनोवैज्ञानिक होता तो जरूर इनको स्केपिस्ट जीव बताता!


खैर, उस महिला ने इन 'लट्क्न्त' जीवों की जम कर ख़बर ली। ऐसे डांट पिलाई कि लड़के भीगी बिल्ली बन गुपचुप रह गए। वैसे लड़के कुछ कम न थे पूरे दबंग! मगर उस महिला के डीलडौल और तेज आवाज से हुए इस गुरिल्ला अटैक' से भौंचक्के रह गए। न कुछ कहते बन पाया, न कुछ करते। चुपचाप ऊपर आ तो गए, मगर क्षण भर में ही अपने खोये हुए पौरुष का एह्साह हुआ। महिला आगे जा चुकी थी सो फ़िर से प्रत्यक्ष मुठभेड़ की संभावना को नकारते हुए फ़िर से आकर दरवाजे पर लटक गए।

गरीब कमजोर जनता को धकेलते हुए और कुछ बदनसीबों का पददमन करते हुए महिला रणभूमि में विजयी सेना की भांति रोंदते हुए आगे बढती जा रही थी। लगभग सभी सीट भरी हुई थी। तभी उसकी नज़र आगे की सीट पर पड़ी। महिला आरक्षित सीट पर विराजमान पुरूष !देखकर ही मन में सुगबुगाहट उठी। फ़िर बगल में सुकुचाई हुई, बस के खंभे को कसकर पकड़ी लड़की दिखाई दी। पल भर में ही सारा मांजरा उसकी समझ में आ गया।

कुलांचे मारते हुए सीट तक पहुँची और अंगार भरी निगाहों से उन पुरुषों की तरफ़ देखा। इस बार वे इस महिला की उपस्थिति को नकार न पाये। उसके जौहर वे पहले ही देख चुके थे सो ज्यादा हीलहुज्जत किए बिना ही उठ लिए। महिला मय बैग सीट पर धम्म से बैठी। लड़की को इशारा कर पास बुलाया और साथ में बिठा लिया।

उस लड़की के लिए यह एक नया पाठ था। उसने नज़रें उठा कर उन पुरुषों की तरफ़ देखा, जो खिसिया कर अब स्थानीय राजनीति पर बहस करने लगे थे। खिड़की से आती हुई बयार से पसीने के साथसाथ उसका संकोच भी हवा हो रहा था।

चित्र साभार: betta design (क्रिएटिव कॉमन लाइसेंस)

सिटी बस में दो महिलाएं - भाग 1

सिटी बस ठसाठस भरी हुई थी। जिधर देखो सर, हाथ, पैर ही दिखायी पड़ते थे! लोग इस कदर भरे हुए थे कि मालूम होता था मानो एक दडबे भर मुर्गियों को एक पिंजरे में ठूंस दिया गया हो। कहीं कोई कुहनी किसी कमर को गुदगुदा रही थी, तो कहीं कुछ पैर दूसरों पर विराजमान थे। कुछ लोग मय झोला- बैग सफर कर रहे थे- जिससे बस की रक्त वाहिनियों का संचरण अति संकुचित हो चुका था। इंजन की आवाज से लगता था मानो बस आंखिरी साँसे गिन रही हो।

आगे की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित रहती हैं। आज बस में महिलाओं की संख्या कम थी इसलिए कुछ पुरूष इस मौके का फायदा उठा कर कब्जा जमाये बैठे थे। तभी बस में एक नवयुवती चढी - लम्बी-दुबली सी, सकुचाई नजरों से इधर उधर देखती हुई आगे बढ़ी। लगता था ९ से ५ का अपना दफ्तर का कोटा पूरा करके आई थी। बस दुबारा चले हुए पाँच मिनट हो चुके थे। अब लड़की की जान में जान आई। पिछले पाँच मिनट से वह आसपास के वातावरण से अभिज्ञ सर झुकाए खड़ी थी। अब उसके चेहरे के भाव कुछ संयत हुए - उसने सर उठा कर चारों ओर नज़रें घुमाई, कुछ महिला आरक्षित सीट पर पुरूष बैठे थे।

उसके संकोची मन में कई विचार उठे लगे, कुछ अनिर्णीत पलों के बाद वह आगे बढ़ी और उस सीट के पास जाकर खड़ी हो गई। उसे लगा कि सीधे कह देना उचित न होगा, वहां बैठे पुरूष उसके लिए स्वतः सीट खली कर देंगे।


५ बजे कई दफ्तरों में छुट्टी हो जाते है। दिन भर से सर खपा कर लोग सीधे अपने घर, अपने परिवार के पास जाना चाहते हैं। बड़े शहरों में किसी को एक दूसरे से कोई मतलब नही, सब अपनी धुन में मस्त रहते हैं। यह कोई छोटा-मोटा क़स्बा नही कि आप भोजन के पश्चात् एक चक्कर काटने निकले तो आठ-दस पहचान वालों से दुआ सलाम हो गई। यह महानगर है ! यहाँ अपने पड़ोसी का परिचय प्राप्त किए बिना ही जिंदगी निकल जाती है।

वहां बैठे हुए पुरूष भी इस '९-५' नस्ल की उत्पत्ति थे - एकदम मोटी खाल! इस बात को ताड़ गए, निर्लज भावः से जम्हाई भरते हुए खिड़की से बाहर हवा खाने लगे। पूरे बस में बैठे लोगों की निगाहें उस लड़की पर थी। लड़की का चेहरा लज्जा से लाल था। सर झुकाए, वह पेरों के अंगूठे से कुरेदने का असफल प्रयास करने लगी। मन में रह -रह कर विचार उठ जाते थी - हाय क्यों मैंने ऐसे अपनी भद्द करवाई!

(आगे जारी...)

चित्र साभार: http://www.cepolina.com/

बुधवार, सितंबर 03, 2008

हैप्पी गणेश चतुर्थी!

मैं दिन भर के काम पूरे कर बैठा ही था कि अचानक मेरे एक मित्र दनदनाते हुए घर के अन्दर आए। हाव भाव कुछ अच्छे प्रतीत नही हो रहे थे, कुछ बडबडा भी रहे थे मन ही मन शायद। आते ही कमरे में चक्कर काटने लगे। मैंने थाह लेने के लिए कहा, "हैप्पी गणेश चतुर्थी"! बस फ़िर क्या था उनके सब्र का बाँध टूट पड़ा!

"अजीब बदतमीजी है ! मतलब गुंडागर्दी है क्या? कुछ भी करेंगे?", एकदम से दो -तीन सवाल उन्होंने दाग दिए। मेरे द्वारा दिए गए पानी के एक ग्लास को गटक कर थोड़ा नरम पड़े। "यह लोग भी न, गणेश चतुर्थी के बहाने बस कुछ भी करना शुरू कर देते हैं!"

"अरे क्या हुआ कुछ खुल कर बताइए न ?" मैंने सहानुभूति के भाव चेहरे पर लाकर पूछा।

"अरे यार क्या बताऊँ? सुबह ६ बजे से फुल वोल्यूम में गाने लगा देते हैं। वह भी अध्यात्म रस से भरपूर भक्ति गीत नही - बल्कि हिमेश रेशमिया छाप, कव्वाली टाइप गाने। गाने के बोल कम और छः फुटिया स्पीकर से निकली हुई बीट्स ज्यादा सुनाई देती हैं। सुबह झक मारकर उठा और दूध लेने के लिए नीचे गया तो देखा कि सामने सड़क खुदी हुई है! एक ही गली में बमुश्किल २० मीटर की दूरी पर चार पंडाल छापे हुए हैं। अन्दर "गणपति बप्पा" शान से बैठे हुए 'मोनालिसा स्माइल' दे रहे हैं। मालुम होता था मानो हमारी हालत पर ही तिरस्कार भरी दृष्टि हो!"


"अरे यह तो हर साल का खेल है - कभी दुर्गा पूजा, कभी गणेश चतुर्थी तो कभी और कुछ। ", कहकर हमने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए।

"अजी अब क्या बताएं आपको, गली के सारे निकम्मे लौंडों का किया धरा है ये सब। दो हफ्ते पहले ही कुछ मुस्टंडे आए थे चंदा मांगने।" उन्होंने फुंफकार मार कर कहा। "और हफ्ते भर बाद देखियेगा यही "गणपति बप्पा" कहीं गंदे पानी में फांके मार रहे होंगे!", उनकी बातों में कटाक्ष का भारी वजन था।

"जी हाँ मुझे भी कल कुछ अदन्नी से बच्चे एक रसीद पुस्तिका लिए हुए मिल गए थे गली के मोड़ पे। गणपति के लिए चंदा मांग रहे थे - बड़ी मुश्किल से टरकाया मैंने!", हम भी दांव पर दांव मार रहे थे।

"अब क्या कहें बमुश्किल पिछले महीने ही नगरपालिका वालों ने सड़क की मरम्मत करवाई थी। और अभी तो बरसात भी पूरी तरह नही ढली है। झुमरी तल्लैया का अगला अवतरण यहीं होने वाला है।", वो बेधडक चालू थे। "अभी शाम को थककर घर आया हूँ तो वही रात्री-गान का 'डेली डोज'। मतलब आज की रात को जगराता?"

"Religion is the opium of masses" और "आजकल का भौतिकवादी समाज" ऐसे कुछ मार्क्सवादी विचार हमने भी ठेल दिए। अब वार्तालाप में मजा सा आने लगा था।

मगर वह तो पूरी तरह से बिदके हुए थे। "अजी साहब, कोई इन भले लोगों को बताये - परमात्मा ने रात्रि विश्राम के लिए बनाई है ; जिसको 'राखी सावंत नैट' मनानी हो वो डांस बार में जाए!"

हमने ठहाके के साथ मिठाई की तश्तरी उनकी तरफ़ सरकाई। दो -तीन कदाचित स्थूल लड्डुओं और निर्बल बर्फियों को निपटाने के बाद वो कुछ ठंडे पड़े। "अच्छा आपका बिस्तर यही लगवा देते हैं, आज रात तो आराम कर लीजिये!", यह प्रस्ताव उन्हें संयत कर गया।

"अजी आज की रात तो कट जायेगी मगर अभी तो विसर्जन में दस दिन बाकी हैं, तब तक तो हमारा गोभी चूरमा बन जायेगा।" ऐसे कहते हुए उन्होंने चद्दर मुंह पर ले ली।

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शनिवार, अगस्त 23, 2008

एक ट्रेन यात्रा

जेठ की भरी दुपहर! ट्रेन के अन्दर बैठे सभी मुसाफिर बेदम हैं। कमीज पसीने से गीली हो पीठ से चिपकी जा रही है। पहली बरसात में हर चप्पे पर फूट पड़ने वाले मशरूमों की तरह, गले में उग आई घमोरियों को खुजला - खुजला कर एक बच्चा परेशान था। उसकी माँ बीच - बीच में "एक के साथ दो मुफ्त" ब्रांड वाले पावडर को छिड़क देती थी। मगर कुछ ही समय में पसीना बरसाती नदियों की भांति उसे बहा ले जाता था। कुंठित होकर बच्चा अपने पैर पटकने लगता तो बगल में बैठे उसके पिता आँखे दिखने लगते। बच्चा आशा भरी नजरों से बार-बार खिड़कियों की तरफ़ देखता था। अभी कुछ समय पहले ही पिता ने खिड़की खोलने की कोशिश की थी। जरा सी जगह मिलते ही यूँ गरम हवा का झोंका अन्दर आया मानो गरम तवे पर हवा को सेका गया हो। तबसे खिड़कियाँ तो बॉर्डर की तरह सील की जा चुकी थी। जरा सा भी हलचल हुई तो गार्ड नुमा यात्री आँखें तरेरने लगते - जुर्रत है क्या?

माँ बच्चे का सर सहलानी लगी । ट्रेन चले हुए ३ घंटे तो हो ही चुके थे। इस बार गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर जायेंगे - इस प्रलोभन मात्र को मन में दबाये हुए बच्चा कुछ शांत था। नानी के घर पहुँच कर बर्फ वाला रूह अफजा और रसना मिलेगा - फ़िर नानी की गोद में बैठ कर रबडी वाली ठंडाई उडाई जायेगी! डेढ़ महीने तक पढ़ाई से छुट्टी और टीवी देखने की आजादी। फ़िर पिछली गर्मियों में बनाये हुए दोस्तों से भी तो मिलना है। ही मैन, सुपर कमांडो ध्रुव और न जाने कौनसे पोस्टर और स्टीकर इकठ्ठा किया हैं उसने - दोस्तों पर रोब ज़माने के लिए।

बच्चे की माँ भी सोच में थी - न जाने गुड्डी के रिश्ते का क्या हुआ? उसकी शादी के बाद बस छोटी बहिन गुड्डी की ही जिम्मेदारी रह गई थी। पिछले हफ्ते ही माँ ने ख़बर दी की एक लड़का देख कर गया है। लड़का तो अच्छा ही था - लाल बाज़ार वाले स्व. लाला रतनलाल जी प्रपोत्र है, ऊँचा खानदान , भरे बाज़ार में दुकान, तिमंजिला घर, परिवार के नाम पर बस एक छोटी बहिन - वो भी कुछ समय बाद विदा हो जायेगी। और माँ -बाप तो बस कब्र में पाँव लटकाए बैठे हैं। राज करेगी अपनी गुड्डी। वह घर जाकर माँ -पिता को समझायेगी कि ये वर हाथ से न जाने दें। जो भी देना दुआना है बस पूरा करो - लड़का हाथ से निकलना नही चाहिए।

राजू की पढ़ाई का भी न जाने क्या हुए। पिछले साल ही द्रितीय श्रेणी से बी. कॉम. किया है मगर नौकरी का कुछ पता नही। अभी घर के काम में हाथ बंटाता है। पिताजी की नौकरी और दो साल तक है - तो काम चल जाएगा। मगर जब घर में बहू आएगी तो क्या होगा?


इस बार इंदौर में आम की अच्छी फसल हुई है। पेड़ तो मानो लद गए हैं - दो बोरे अचारी आम ट्रेन की सीट के नीचे रखे हुए हैं। भोपाल जाकर अचार बनाया जायेगा - कुछ हाथ बंट जाएगा, यहाँ तो अकेले ये सब करने की हिम्मत ही नही है।

बच्चे के पिता शून्य में तांकते हुए सोच रहे हैं। वापस आकर छोटू का एड्मिशन नए अंग्रेज़ी स्कूल में करना है। आख़िर कब तक इस हिन्दी मध्यम बाल विद्या भारती विद्यालय में पढेगा? पिछले हफ्ते शर्माजी यूँ दफ्तर में बघिया रहे थे - उनके सुपुत्र को अंग्रेज़ी में पूरे पिचानवे 'मार्क्स' मिले हैं। जब भी घर जाओ तो छाती फुलाकर बेटे से 'बा - बा ब्लैक शीप' कविता का पाठ करवा देते हैं। मालुम होता है अँगरेज़ अपनी विरासत में से कुछ हिस्सा इनके नाम लिख गए हों! वैसे बात हो सही ही है - अंग्रेज़ी का बोलबाला है। कहीं कुछ काम नही होता इसके बिना।

लेकिन अंग्रेज़ी स्कूल की मोटी फीस का इंतज़ाम कहाँ से हो? यूँ ही तंगहाल हैं अब ये नए शोशे ! मगर शर्मा जी के उस गर्व भरे अट्ठाहस के सामने सब तर्क विफल थे। इस महंगाई के ज़माने में सरकारी नौकरी से क्या होता है - अब बोनस मिलने के बाद ही कुछ इंतज़ाम भी हो पायेगा। और हाँ, लालाजी को कहकर घर की छत भी सुधारवानी है। पिछली बरसात खत्म होने पर ही चूने लगी थी - और दीवारों की सीलन हो महीने भर बाद भी न गई थी। न जाने कब अपने घर में रहना नसीब होगा?

अचानक ट्रेन के झटके ने तंद्रा भंग की। ट्रेन की गति कम होती जा रही थी। दूर धुंधला सा भोपाल स्टेशन दिखाई पड़ रहा था। धूप भी कुछ मंद पड़ चुकी थी। खिड़कियाँ खोली गई - ताज़ी बयार ने पसीने से कुछ राहत दी। ढीली सी गति से होते हुए ट्रेन प्लेटफार्म पर जा लगी। खिड़की से बाहर झाँका तो सामने खड़ा राजू दिखाई दिया। झटपट आकर आम की दो बोरियां, सूटकेस और बैग ट्रेन से बाहर लाद दिए। फ़िर पैर छुए और गले मिला। पीछे और भी लोग इंतजार कर रहे थे। घर पहुँच कर सब पंखे के नीचे लधर गए। फ़िर बर्फ का ठंडा पानी मिला तो जान में जान आई। चारों और सब लोग खुश थे। छोटू नानी की गोद में खेलते हुए नई गेंद को सराह रहा था।

एक झोंके से सारा पसीना छू हो चुका था!

चित्र साभार: विकीमिडिया कॉमनस

सोमवार, अप्रैल 21, 2008

हाउ टू बी अ सोशियालायिट

Socialite - A socialite is a person (male or female, but more often used for a woman) of social prominence who spends significant resources entertaining and being entertained but is not (at least in the early 20th century heyday of socialites) a professional entertainer. A socialite is usually a member of the upper class or aristocracy with their social movements categorized in high-society magazines. - from Wikipedia.

मुझे पब्लिक ने कहा कि मैं सोशियल नहीं हूँ (इसका मतलब एंटी - सोशियल से न जोडा जाए )। घर पे गया तो पिताजी बोले ,"बेटा कुछ सोशियल बनो" - । "मुझे सोशियालिस्म से कुछ ख़ास लगाव नही है"- मैंने ऐसा टंग-इन-चीक कमेन्ट दिया तो वह आँखे दिखाने लगे। अब पिताजी को निबटा के साँस भरी ही थी कि फ्रेंड्स ने बिगुल बजा दिया - "अबे कैसा है तू ?", मैंने कहा, "मैं ऐसा ही हूँ"। काफ़ी समय तक उनको इग्नोर करने के आजकल मैं सोशियल बनने की कोशिश कर रहा हूँ।

वैसे सोशियलायिट होना भी एक कला ही है। इसके निदान के लिए "लाख दुखों की एक दवा" विकिपेडिया पर खोजा गया तो पता चला कि इसके लिए कुछ स्टेप्स हैं।

1. अच्छा नाम होना चाहिए। जैसे तारापोरवाला , सिंघानिया, मल्होत्रा, गोदरेज आदि अनादी। ज्यादा चूल हो तो क-अक्षरधारी किसी भी प्रदूषित धारावाहिक का अवलोकन किया जा सकता है - मगर अपने रिस्क पे। अब "लल्लन पाण्डेय" जैसे चिरकुटिया नाम का प्रयोग तो बिल्कुल ही अनफ़ैशनेबल है - अपने पैर पर कुल्हाडी मारने जैसा। हाँ, मिसेज पूनावाला एकदम "इन" नाम है।
2. लूक्स ऐसी हों कि लगे मानों राजघराने के वारिस आज अनाथालय में बक्शीश देने आए हों। यह न हो कि नाम हो लिल्लेटे दुबे और शकल हो हैदराबाद के लाद बाजार में चूडियाँ बेचने वाले सारखी।
3. आपका ग्रेजुएशन सही सब्जेक्ट से हो - जैसे इंग्लिश या फ्रेंच लिटरेचर , रोमन कला और साहित्य, साइकोलोजी या इकोनोमिक्स। हिन्दी साहित्य या राजनीती विज्ञान जैसे आत्मघाती शब्दों का प्रयोग तो कतई न करें। देहरादून या नैनीताल के बोर्डिंग स्कूलों में बचपन निकला हो तो सोने पे सुहागा!
4. आप कई सारे ट्रस्ट या कमिटी के सदस्य हों तो अच्छा होगा। हॉस्पिटल, चेरिटी, समाज के निम्न (गिरे हुए) वर्गों से संबंधित कुछ मिल जाए तो इमोशन का तड़का भी आ जाए। वैसे आजकल HIV - AIDS का बाज़ार भी काफ़ी गरम है।पूजनीय श्रीमती राधा बाई गंगवाल धर्मशाला का जिक्र नुकसानदायक हो सकता है।
5. शौक ऐसे पालें मानो नवाब के जाने हों! गोल्फ, पोलो,टेनिस, हौर्स रायडिंग, फार्मूला वन जैसे खेलो में रूचि रखें।गोल्फ क्लब की सदस्यता लें - किरकिट, हॉकी, कब्बडी जैसे सड़कछाप खेलों से दूर ही रहे। हाँ, IPL में रूचि दिखा सकते हैं।


6. गाल को चूमना सीखें - मगर भडैत तरीके से नहीं - बस हवा में एक किस। लंबा वाला सेशन पार्टी के बाद कार में पूरा कर सकते हैं।
7. होटल में समय बिताएं। एक रात के लिए कमरा लेकर दोस्तों को पार्टी पर बुलाएं - कह सकते हैं कि घर पे आप "बोर" हो गए थे - या फ़िर "यू नीडेड अ ब्रेक"। उपरोक्त उपाय प्रायतः काफी सफल पाया गया है।
8. चमकने वाले कपड़े पहने, जितनी चमक उतना असर ! लंदन और फ्रांस का लेबल हो तो बात बन जाए।
9. चेहरे पे सदा एक मुस्कान बनी रही - कैटरिना कैफ जैसी -(कमबख्त हर सीन में एक ही चेहरा ले के आ जातीहै)। एकदम ग्रेसफुल और नॉन-चलेंट रहें - दीन दुनिया से अविचलित। भले ही आपके सामने अभिषेक बच्चन खड़ा हो - यूं बिहेव करें कि मानों आपके लिए ये रोज की बात हो!
10. एंड लास्ट बात नेवर द लीस्ट - बात करने का लहजा सीखें। "यू लुक बियुटिफुल/गोर्जियस " के बजाय " यूलुक डिवायिन / डिवास्टेटिन्ग " बेहतर है। आप जो भी कहें वह एक्साइटिन्ग होना चाहिए - आम घरेलु काम को सजा -धजाकर बताएं।

अब मुझ जैसे देहाती - अनरिफ़ाइन्ड का न जाने क्या होगा मगर आप ही शायद इन तरीकों से लाभ उठा पाएं - इसी से मेरा लेख सार्थक हो जाएगा।

नोट - आज के इस भाषाई डायरिया के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। मगर क्या करूँ एक प्रोस्पेक्टिव सोशियालायिट को इसी भाषा का प्रयोग मान्य है!

रविवार, नवंबर 18, 2007

दिल्ली की दारु और कोल्हापुर की मर्सीडीज़

बतंगड जी लिखते हैं कि पिछले वर्ष दिल्लीवाले ७८,००० बोतल शराब पी गए ( बोतल के आकार/क्षमता के बारे में उन्होने कुछ नहीं कहा )। साथ ही १६ लाख नयी कारें भी खरीदी गयीं। कुल मिलाकर दिल्लीवासियों की औसत कमाई सालाना ६१,६७६ हो गयी है जो गोवा के बाद देशभर में सबसे ऊपर है। उनकी भाषा में से समाजवाद की बू आती है। आख़िर इस सब में गलत क्या है - चिंता की बात तो तब होती जब लोग खाने के लिए चोरी करने लगें!


महाराष्ट्र में मुम्बई के बाद सबसे ज्यादा मर्सीडीज़ कहाँ पायी जाती हैं बताइए जरा ? ज्यादा सिर मत खुजाइये मैं बताता हूँ - कोल्हापुर। गन्ना,धातु - खनन और कपडा उद्योग से कमाई हुई दौलत के दम पर ये छोटा शहर आज भारत मैं औसत सालाना कमाई की सोपान पर काफी ऊपर है। अब पैसा है तो शौक भी -चाहे दारू पियें या मर्सीडीज़ खरीदें - किसी को फिक्र है क्या ? कम से कम कोल्हापुर वासियों को तो नहीं! आख़िर हम कब अपनी इस भौतिकतावाद विरोधी मानसिकता से बाहर निकलेंगे ?

भगवान् राम की जन्मतिथि

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम भारत के जन मानस में सदियों से घर किये हुए हैं। इस कदर कि दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले "रामायण" के पात्रों को अभिनीत करने वाले कलाकारों को जन साधारण ने पूज्य माना है! इन्ही प्रभु राम की पिछले कुछ समय में सेतु समुद्रम मामले में काफी छीछलेदार हुई है। कुछ बडबोले नेताओ ने तो श्री राम के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिए थे! वैसे मुझ जैसे एग्नोस्त्त तो बाहर से तमाशा देख रहे थे और सोच रहे थे कि इंसान पहले तो खुद किसी को भगवान् बनाता है और फिर खुद ही उनकी प्रामाणिकता पर सवाल उठाता है!

सही कहा है वोल्टेयेर ने ,"If God did not exist, it would be necessary to invent him."

अब इन बातों का एक असर यह भी हुआ है कि कई लोग जो कि इस ओन्स्लौट से निष्प्राण रह गए थे वो फिर से सिर उठाने लगे हैं। इन जनाब का कहना है कि आने वाली १० जनवरी २००८ को श्री राम ७१२२ वर्ष के हो जायेंगे ! इन्होने यह तिथि आर्कियो-एस्त्रोनोमी ( पुरातत्व और खगोलविद्या के मेल से बनी एक नयी विधा) के बल पर प्राप्त कि है। इन्होने कुछ और महत्वपूर्ण तिथियाँ भी डिराइव की हैं जो मैं नीचे चिपका रह हूँ।

Sri Rama Navami - Birth day 10th January 5114 BCE
Birth of Bharatha 11th January 5114 BCE
Pre coronation eve 4th January 5089 BCE
Khar, Dushan episode 7th October 5077 BCE
Vali Vadham 3rd April 5076 BCE
Hanuman's Visit to Lanka 12th September 5076 BCE
Hanuman's Return from Lanka 14th September 5076 BCE
Army March to Lanka 12th September 5076 BCE

अब इस नविन विधा की प्रमाणिकता और वैज्ञानिक समुदाय में इनकी मान्यता क्या यह तो वही जाने, हमारा काम था बताना सो हमने किया ! वैसे आप देख ही सकते हैं कि ये तिथियाँ आपस में ही असंगत हैं!

शनिवार, नवंबर 17, 2007

बौब कट वाली महिला

जब मैं शुरू में हैदराबाद आया था तो यहाँ बौब कट वाली कई महिलाएं दिखीं। आश्चर्य मिश्रित हर्ष हुआ ,मगर अधिकतर स्त्रियाँ निम्न-मध्यम वर्ग से थीं इसलिए थोडा अजीब भी लग रहा था ! ढोल गंवार डेली लेबर वाली औरत और ऐसा फैशन ? आंध्र प्रदेश तो मेरी उम्मीद से भी आगे निकला। जहाँ महिलाओं की इज्ज़त हो, इतनी स्वतंत्रता हो, वह बड़ा ही प्रगतिशील समाज है - ऐसे सुविचार मैं अपने मन में पाले हुए था। ऐसी महिलाओं को दूर से देख कर ही मन में आदर मिश्रित श्रध्दा के भाव उभर आते थे। मगर दिमाग के किसी कोने में एक शक रूपी कीडा मंडरा रहा था। खैर बात आई गयी हो गयी।

कुछ दिन बाद एक मित्र ने तिरुपति के दर्शन की बात कही। फिर क्या था - गूगल लेकर के उठा पटक मचा दी! कैसे जाना है, कहाँ जाना है, कहाँ रुकना है, कहाँ खाना है, दर्शन कैसे होंगे - आदि अनादी सभी सवालों के हल ढूँढ निकाले। आन्ध्र प्रदेश में हैं तो बिना तिरुपति दर्शन के कैसे चलेगा?

इसी खोजबीन में तिरुपति मंदिर के बारे में भी थोडा ज्ञान प्राप्त किया । अचानक कुछ देख कर के अपने सिर पे हाथ रख लिया - अभी तक तेरी ट्युबलाइट क्यों न जली ? मूर्ख ! वो बडे शहरों में रहने वाली तितलियों की तरह फैशन में पागल नहीं बल्कि धर्मांध स्त्रियाँ थीं। तिरुपति के मंदिर में अपने केश दान करके आई थीं। उफ़ मैंने यह पहले क्यों न सोचा।

आगे कुछ अनुसंधान करने पर यह ज्ञात हुआ कि जेनिफर लोपेज़ , पेरिस हिल्टन, निकोल रिची, जेनिफर एनिस्टन और वेनेथ पेल्त्रो जैसी मशहूर हौलीवुड हस्तियाँ भी भारतीय बालों की मुरीद हैं! यह भी पढने में आया कि विक्टोरिया बेकहम जैसी मशहूर अदाकारा हर महीने २००० पौंड (लगभग १ लाख ६० हज़ार रूपये) अपने बालों को "शेप" करने में खर्च करती हैं। मेधा पाटकर को मिल जाएं तो बाल न नोंच लें उनके !



लंदन अकेले में ऐसे ५० सैलून हैं जहाँ ये "टेम्पल हेयर" मिलते हैं। बालों के इस लेनदेन में पिछले वर्ष ३०० मिलियन USD (~ १२ अरब रुपये ) का कारोबार हुआ ! इतना पैसा देखकर अब मंदिर समिति के अलावा अब कई बिचोलिये भी बाज़ार में आ चुके हैं। वैसे कुछ फिरंगी क्रिश्चन भी इस मामले को लेकर कुछ उत्तेजित हैं।

जहाँ पहले महिलाएं धार्मिक श्रध्दा और विश्वास के कारण केश दान करती थी वहीं आज उन्हें अपनी केश शोभाबेचने के लिए मजबूर तक किया जा रहा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि तिरुपति मंदिर की कमाई का एक बड़ाहिस्सा "बालों" से आता है। पिछले साल तिरुपति मंदिर ने लगभग ३२ करोड़ रूपये इसी तरह नीलामी में कमाए।

बहरहाल हम तिरुपति तो न जा पाए मगर अब बात निकली है तो बता ही दिया।

वो पुराने दिन ...

काकेश जी का भारतीय रेलवे के बारे में ब्लॉग पढ़ा तो मुझे भी अपने पुराने दिन याद हो आए. रही रेलवेके खाने की बात. तो याद आया की कभी मैं घर जाते समय मथुरा रेलवे स्टेशन पर रेलवे के जलपान गृहमें खाना खाया करता था. जैसी भोजन की थाली की तस्वीर काकेश जी ने चिपकायी है कुछ कुछ वैसीही . खाना तो बस ठीक-ठाक ही था मगर मथुरा के रेलवे स्टेशन पे वही सबसे अच्छा विकल्प था. प्लेटफोर्म पे लेटे हुए और गुदडी में सिमटे हुए लोग , पुलिसिया रॉब दिखाते हुए जेब में हाथ डालकरघूमता हुआ हवालदार, वेटिंग रूम में बैठकर अपनी ट्रेन का इन्तेजार करते हुए “रिज़र्वेशन” वाले लोग , प्लेटफोर्म पर मंडराते हुए - परेशान नजरों से इधर उधर ताकने वाले “जनरल” लोग, और अगर गलतीसे एसी वाले “बड़े साहब” आ गए तो फ़िर खैर ही नहीं!



आज हवाई जहाज से यात्रा करता हूँ मगर फ़िर भी वह मजा नहीं. हर आदमी बाये मुंह करके बैठा रहताहै. बस ताकते रहिये अधर में! गलती से भी किसी को देख लिया तो यूं हीन नजरों से देखता है मानो कोईअपराध हो गया हो. इतना ही अभिमान है तो इकोनोमी क्लास में क्यों यात्रा करते हैं , जाइये न बिजनेस क्लास में?