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शुक्रवार, सितंबर 20, 2013

हज - किश्त ३

पिछली कड़ियाँ यहाँ पढ़ें:
हज - क़िस्त १ 
हज - क़िस्त २ 

उस दिन तड़के ही फ़ारुख़ की नींद खुल गयी थी। आम तौर पर रुखसाना सुबह फ़ारुख़ से पहले उठ कर घर के कामों में लग जाती थीं मगर आज तो नजारा ही बदला था। रुखसाना सुबह आँख मलते हुए उठी तो सामने देखा कि फ़ारुख़ नहा धो और तैयार हो सामने बरामदे में चक्कर लगा रहे थे। रुखसाना झटके से उठीं और मुँह पर पानी के छींटे मार घर के काम निबटाने लगीं।

उधर फ़ारुख़ की रगों में तो जोश की लहरें रवां हो रही थीं। न जाने किस अनजान रूहानी ताक़त ने उनके ज़िस्म में नयी जान डाल दी थी। इतने सालों से सजाया सपना आज पूरा जो होने वाला था। तकस्सुल जिस्म एक साथ इतनी सारी जज़बाती लगन देख, उसे संभाल नहीं पा रहा था इसलिए चक्कर लगा उस सरगर्मी को नफ़ी करने की कोशिश कर रहा था।

नाश्ता करने के बाद फ़ारुख़  ने मंजूर को आवाज दी - जाओ बेटा जरा एक ऑटोरिक्शा ले आओ। फिर फ़ारुख़, रुखसाना, शाहरुख़, सलीम, अफ़साना और मंजूर को साथ लिए रिक्शे पर चल दिए। रुपयों की थैली एक बैग में बंद थी। रिक्शे पर बैठे हुए, फ़ारुख़ की आँखों के सामने उनकी पूरी जिंदगी की दास्ताँ गुज़र रही थी। अपना बचपन, खेल, वरज़िशी, खिलन्दड़ी, लड़कपना, निकाह, बच्चे, कारखाना, कारीगर, मशीन, कपड़े, तंगी, झगड़े ,फब्ती सब गुजर रहे थे।

अचानक रिक्शा रुक गया और साथ ही में फ़ारुख़ के ख्यालों की गाड़ी भी। आगे देखा रास्ते में काफी भीड़ जमा थी। रिक्शे का पार हो पाना नामुमकिन था। फ़ारुख़ रुपयों का बैग हाथों कस कर पकड़े रिक्शे से उतरे और सलीम से बोले - जरा देखो क्या बात है। सलीम ने वापस आकर बताया - अब्बा अपने कारखाने में काम करने वाले मदन के साथ एक हादसा हो गया है। आज सुबह दुकान की तरफ जा रहे था कि किसी लॉरी ने टक्कर मार दी। वहां उसकी बीवी और बच्चे रो पीट रहे हैं इसीलिए मज़मा लगा हुआ है।


फ़ारुख़ आगे बढ़े और भीड़ को चीरते हुए अन्दर पहुँचे तो देखा कि दिल दहला देने वाला नज़ारा था। मदन लहूलुहान रास्ते पर पड़ा था। उसके सर पर गहरी चोट लगी थी। उसकी बीवी उसका सर अपनी गोद में रख उसे हिला - हिलाकर उससे बात करने के कोशिश कर रही थी। फ़ारुख़ ने तुरंत उसे ऑटोरिक्शा में बैठवाया और अस्पताल ले गए। और भी कई लोग साथ आये।

अस्पताल में मुआयना करने के बाद डॉक्टर ने कहा कि खून बहने की वजह से इनका काफी नुक्सान हो चुका है  सो इन्हें तुरंत ही ऑपरेशन के लिए ले जाना होगा। ऑपरेशन की फीस डेढ़ लाख रुपये, वहाँ रिसेप्शन पर जल्द से जल्द जमा कर दें। पैसे का नाम सुनते ही भीड़ में से कई तो यूँ ही रफूचक्कर हो गए। फारुख ने मदन की बीवी को तलब किया तो उसने बताया कि ग़रीबी की हालत में वो इतने रुपयों का इंतज़ाम नहीं कर पायेगी। उधर नर्स ने आकर कहा कि जल्द पैसे जमा करवाएँ नहीं तो मरीज़ की हालत और भी ख़राब हो सकती है।

फ़ारुख़ ने अपने घर वालों से सलाह ली। वे काफी दिमागी कशमकश में थे। फिर उन्होंने रुखसाना की तरफ एक नज़र डाली और उन्हें ज़वाब मिल गया। उन्होंने रुपयों का बैग मदन की बीवी के हाथ में थमाया और कहा कि इलाज़ में इनका इस्तेमाल करे।

अस्पताल से बाहर निकलते हुए रुखसाना से बोले - अल्लाह की मर्जी होगी तो फिर किसी और साल हज़ कर लेंगे। घर की तरफ रुख करते हुए आज फ़ारुख के दिल में अजीब सा सुकून था।

(समाप्त)

गुरुवार, सितंबर 19, 2013

हज - क़िस्त २

पिछली किश्त यहाँ पढ़ें:

हज - क़िस्त १

काफी समय से फ़ारुख़ के ज़हन में एक ख्याल जड़ कर रहा था। उनकी दिली ख्वाहिश थी कि मरने से पहले एक बार जरूर हज कर लें। अपनी बीवी से अक्सर कहा करते थे, " रुखसाना, इस जहाँ की तो कर ली अब उस जहाँ की देखी जाये!"। रुखसाना घर के हालत से तो वाकिफ़ थी मगर अपने शौहर की हाँ में हाँ मिला गहरी साँस भर लेती थी।

गुरब़त में जिंदगी गुज़ार अब फ़ारुख़ अपने ख्व़ाब को पूरा करने के करीब थे। तिल तिल कर उन्होंने इतने सालों से कुछ पैसे जमा किये थे और जो मंसूबे बनाये थे उन्हें अमली जामा पहनाना का वक़्त नज़दीक आ रहा था।

अब शब भर वे आँखे खोल कर छत को ताड़ते थे। कभी नींद टूटती तो खुद तो पाक काब़ा के चक्कर काटते हुए पाते। हर समय यही सोचते रहते कि कब वहाँ जाना नसीब होगा और वहां जाकर वे क्या करेंगे। रुखसाना से जिक्र करते तो वह झड़प कर कहती - जितनी लम्बी चादर हो उतने ही पैर फ़ैलाने चाहिए। फ़ारुख़ अन्दर ही अन्दर मुस्कुराते और पलट कर सो जाते।


फिर एक दिन अन्धौरी में टेम्पो चलाने वाले उनके पड़ोसी पाशा ने बताया कि सरकार हज यात्रा के लिए दरख्वास्त क़ुबूल कर रही है। बस फ़िर क्या था, फ़ारुख़ ने दुकान पर मंज़ूर को बैठाया और निकल पड़े। अर्जी लेकर शाम को घर पहुंचे तो सबके सामने अपने इरादों को ज़ाहिर किया। मान मनुव्वल के बाद सब राज़ी ख़ुशी हुए कि अब्बा और अम्मी हज पर जा रहे हैं। फ़ारुख़ खुदपरस्त इंसान थे और उन्हें इस बात का गुरूर था कि वे सरकार की दी हुई खैरात का इस्तमाल नहीं कर रहे थे।

शाम के अँधेरे में फ़ारुख़ ने सारे पैसे निकाल कर जोड़े - पूरे २ लाख थे। उनका और रुखसाना का हज का खर्च उठाने के लिए काफ़ी था। बस अब कल सुबह अर्जी सरकारी दफ्तर में जमा करना बाकी था। आने वाली सुबह का ख्वाब आँखों में सजाये,आज बहुत दिन बाद फ़ारुख़ चैन की नींद सोये थे।

आगे जारी …

चित्र साभार - मुहम्मद मेहदी करीम 

बुधवार, सितंबर 18, 2013

हज - क़िस्त १

फ़ारुख़ सईद की उम्र उन्सठ के करीब रही होगी। पिछले तीस बरस से वे अन्धौरी में दर्जी का काम कर रहे थे। दर्जीगिरी उनके खून में थी और ऊपर वाले की रहमत थी कि हाथ का काम था एकदम साफ़। कारीगरी का नये से नया नमूना उनकी दुकान के पीछे बने एक छोटे कारखाने में हर पहल ही ईज़ाद होता था। छोटे से गाँव में रहते थे मगर काम और नाम काफी दूर तक फैले थे। आजमगढ़ के बड़े से बड़े बनिए अपनी दुकान में फ़ारूख़ के सामान की नुमाइश करते थे।

फ़ारुख़ अपने पेशे पर फ़क्र करते थे मगर उसके मज्द से इतना राजी न थे। बदलते वक्त के साथ आज मशीन से बने, मघरबी डिजाईन वाले कपड़े, काफी कम कीमत पर बाजार में मुयस्सर हों तो कोई क्यूँ हाथ की कारीगरी का इंतज़ार करे। होने वाले मुनाफे का अधिकतर हिस्सा बजाज अपनी अंटी में खोंस लेते थे। बची खुची कमाई कारीगरों की पगार, दुकान का सामान और खाते बनाने में चुक जाती थी। घर खर्च बादिक्कत ही निकल पाता था इस वजह से घर का माहौल कुछ तल्ख़ रहता था।


काम के अलावा वे एक और चीज़ पर फक्र करते थे और वह थी उनकी वल्दियत। कई पुश्तों पहले उनके दादे-परदादे मालवण - कोंकण से आजमगढ़ आये थे। उनका मानना था कि वे, आठवीं सदी में हिन्दुस्तान आये और यहीं बसे, अरब सौदागरों की नस्ल से हैं और बसरा (ईराक) में उनकी अस्ल बसायत है। घर में फाक़े मारने की हालत होने पर भी वे अपनी नाक न नीचे होने देते थे।

यूँ तो तंगी के कारण फ़ारुख अपने बीवी और बच्चों के ताने सुनते रहते थे मगर अनसुना सा कर देते थे। बड़ा बेटा मंज़ूर काफी समय से अपनी परचून की दुकान खोलने के लिए कुछ पैसे माँग रहा था, मंझला सलीम नए कपडे, छोटा शाहरुख़ क्रिकेट का बैट और बेटी अफ़साना चूड़ी, लिपस्टिक और चुनरी। रुखसाना के सोने के कंगन तो कई साल से कतार में थे। मगर फारुख थे बड़े घाघ। मज़ाल है कि कभी उनके कान पर जूँ भी रेंग जाये!

हाँ मगर किसी को बताये बिना, वे काफ़ी समय से कुछ रक़म जमा कर रहे थे। न जाने क्या चल रहा था उनके दिमाग में?


आगे जारी…

चित्र साभार Coloribus 

रविवार, सितंबर 09, 2012

गेंद

कुछ दिन पहले एक सहयोगी के सुपुत्र के जन्मदिवस पर जाना हुआ। वहीँ यह घटनाएं घटित हुई थी।

केक काटने की रीति से पहले माता पिता ने सगर्व पुत्र को सबके सामने प्रचारित किया। सोफे के पीछे से सर नीचे किये हुए एक "लिटिल मास्टर" प्रस्तुत हुए। गर्दन को चहुँ ओर चकराते और हाथ की उँगलियों को आपस में उलझाते हुए यह सुकुमार आगे बढे। अपने माता पिता के अनुसार उनके सुपुत्र विज्ञान, ज्यामित्री, खगोलशास्त्र और अंग्रेजी साहित्य में निपुण थे। नगर के सबसे महंगे कोचिंग इंस्टिट्यूट में वे अल्पायु से ही IIT के लिए तैयारी कर रहे थे।

पानी का क्वथनांक, ग्रहों का अनुक्रम, पाइथागोरस का सिद्धांत सब एक-एक कर उनकी जिव्हा पर अवतरित हुए। मर्चेंट ऑफ़ वेनिस से उद्धृत कर "हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती" ऐसा प्रमेय उन्होंने प्रदर्शित किया। युवा अवस्था में समाज के मूर्धन्य खंड बनने का भाव भी उस बालक ने प्रकट किया।

माता पिता फूल कर कुप्पा थे। माता इतने प्रतिभाशाली पुत्र को जन्मने पर खुद को बधाईपात्र मान रही थी और पिता सोच रहे थे कि पुत्र के उच्च सरकारी अफसर या नेता बनने पर उनके पास आने वाली सिफारिशों को वे कैसे संचलित करेंगे।

बच्चा संग साथियों को लेकर बाग़ में छुपकर आम चुराने की तरकीब बनाने वाला नटखट कम और Astroboy ज्यादा लग रहा था। बाकी विधाओं का तो पता नहीं मगर रट्टाशास्त्र में यक़ीनन पी एच डी करेंगे ऐसा मेरा मत था। बालपन में सरलता का ऐसा ह्रास देखकर मैं चिंतित था।


अब सब प्रस्तुतजन अपने-अपने बाल गोपाल की प्रतिभा का बखान करने लगे थे। अब तक बात ट्विंकल-ट्विंकल लिट्टिल स्टार, बा-बा ब्लैक शीप, जैक एंड जिल, जॉनी-जॉनी यस पापा से शुरू हो यत्र तत्र अन्यत्र पहुँच चुकी थी।

अंततोगत्वा यह प्रख्यान सम्पान हुआ और किन्ही कृपालु जन ने उन बाल से पूछा - " चलो यह सब सही रहा, अब बताओ तुम्हे क्या उपहार चाहिए?"

महफ़िल में सरसरी सी फ़ैल गयी। अरे इतना प्रतिभावान बालक है, क्या ही मांग बैठे? यह सोच सबके मन में थी। पीछे कुछ सज्जन "इन्सैक्लोपीडिया ब्रितानी" या "शेकस्पियर का संपूर्ण संकलन" पर शर्त लगा रहे थे।

बालक का चेहरा ख़ुशी से खिल उठा! कुछ संकुचाते, कुछ इठ्लाते हुए मुख पर रखे मुखौटे को मानो उतार, कृतज्ञ भाव से उसने कहा - "गेंद"।

आगे का कथानक जानने में रूचि न होते हुए मैंने तृप्त-सम्पुष्टित हो द्वार की ओर मुख किया।

नोट - यह रचना पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की लघुकथा "बालक बच गया" को समर्पित है।

चित्र साभार - http://www.freedigitalphotos.net/


मंगलवार, अगस्त 03, 2010

पूर्वाग्रह (लघु कथा) - भाग २

रिक्शे वाले की नशे से डूबी आँखें उसकी नज़रों के सामने घूम रही थी। वह आँखें खोलने का पूरा प्रयास कर रहा था - बीच में झुंझलाकर कह रहा था - "अरे साहब आप जानते नहीं इसे क्या कहते हैं? "

कई सवाल मन में गूँज रहे थे। मनुष्य मन विश्लेषणात्मक है - किसी भी परिस्थिति का जायजा लेकर खुद को ही समझाता है। "तेरी कोई गलती नहीं..ये लोग होते ही ऐसे हैं... आजकल भलाई का जमाना ही नहीं है .. वगैरह ..वगैरह"

अगर नशे में वह कहीं टक्कर मार देता तो? परिणामों की कल्पना के साथ ही उसका मन सिहर उठा। इस प्रश्न का कोई उत्तर मन के पास नहीं था। मानव मन भी कितना विकल है। कुछ क्षणों पहले ही वह रिक्शे वाले के काल्पनिक परिवार के साथ सहानुभूति जता रहा था और अभी उसी परिवार को मन से बहिष्कृत कर खुद को कोस रहा था। क्या वह प्रसंग एक क्षण की मानवीय दुर्बलता का द्योतक था?


इन्ही सवालों से उलझता हुआ वह नहर तक आ पहुंचा। आगे देखा कुछ मजदूर काम से वापस लौट रहे थे। सर पर धूल - मिटटी से मटमैला हो चुका कपड़ा बंधा था। गठीला-सुडौल बदन, चौड़े कंधे, मजबूत बाँहें। सफ़ेद कुरता और धोती, कंधे पर फावड़ा, हाथ में बीड़ी। मस्तक पर निकल आई पसीने की छोटी बूँदें संध्या की किरणों से झिलमिला कर यूँ कल्लोल कर रही थीं मानो दिन भर के कठिन परिश्रम के बाद प्राप्त हुए इस अल्प अनुग्रह से तृप्त हों।

बरसात के कारण नहर के दोनों तरफ झाड़ियाँ उग आई थीं। इन्ही झाड़ियों में कई भांग की भी थी। लम्बे हरे तने पर टिके सफ़ेद फूल मानो उसे मुंह चिड़ा रहे थे। अचानक एक आवाज आई - "अरे ओ दीनू जरा रुका हो...देखा हियाँ पे का है" - उन में से एक मजदूर पीछे रुक कर उन फूलों की तरफ इशारा कर बोल रहा था।

अशिक्षित गँवई मजदूर, देहाती भाषा और परवेश उसे कुछ पहचाना सा लगा - "देजा वू !" पिछले १५ मिनट की घटनाएं उसकी आँखों के सामने तांडव कर रही थीं। उसका मन घृणा से भर उठा - "ये लोग कभी नहीं सुधरेंगे!"

तभी उसे कुछ आवाजें उसके कान पर पड़ी - "अरे तुलसी ही है! देखो अम्मा कह रही थी, सावन का महिना लग रहा है..... अरे राम परसाद ... देखो जरा तुलसी की एक दो पौंध निकल लें"

कीचड में कमल को चरितार्थ करते हुए, उन भांग के सफ़ेद फूलों के बीच एक छोटा का तुलसी का पौंधा भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। कलियुग के दानवों ने अभी आर्यों का पूर्ण मर्दन न किया था।

चित्र साभार : विकिपीडिया

शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

पूर्वाग्रह (लघुकथा) - भाग १

वह लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ घर की ओर चला। गली के मोड़ पर रिक्शा छोड़ दिया था उसने। आगे संकरा रास्ता था - एक तरफ नहर और दूसरी तरफ झाड़ियाँ। घर जाकर आज कूलर का पम्प सही करवाना था। गर्मी बहुत थी और ऊपर से बिजली में कटौती। बार बार बिजली आने जाने और लो वोल्टेज की वजह से ही पम्प ख़राब हुआ होगा। बीवी के उलाहनों से तंग आ चुका था वो। एक हफ्ते से मोटर ख़राब है, आज तो मिस्त्री को बुलाना ही होगा।

दिनभर ऑफिस में ही घर से माँ के तीन फोन आ चुके थे। घुटने के जोड़ में फिर से दर्द उठ आया है - एक बार डॉक्टर को दिखवा लेते तो... बच्चों को सर्कस भी दिखाना था। ऊपर से ऑफिस में कम काम था भला? नए कॉन्ट्रेक्ट के लिए बॉस ने आज ही प्रोपोसल तैयार करने के लिए कहा था। दिन भर इसी उठा पटक में लगा रहा - देर होने की वजह से रिक्शा लिया।

रिक्शे में बैठने के कुछ देर बाद ही उसे कुछ अलग महसूस हुआ। रिक्शे वाला लगातार पैडल नहीं मार रहा था, एक पैडल मार सुस्ताने लगता - जब रिक्शा एकदम बंद होने को हो तो दूसरा पैडल। जैसे घोर अनिच्छा से ग्रसित हो। उसे अन्दर ही अन्दर झुंझलाहट होने लगी थी। एक तो पहले ही देर हो चुकी थी फिर ये ढीला रिक्शेवाला। जैसे हर सांस लेने से पहले अपने शरीर से याचना कर रहा हो - वैसे देखने में इतना कमजोर तो नहीं लगा रहा था। मतलब ठीक ठाक ही था। फिर पता नहीं ऐसे मरे हुए मन से क्यों रिक्शा चला रहा था। शायद इसकी जिंदगी में भी कोई परेशानी हो - गाँव में बीवी बच्चे, अनब्याही बहिन, आवारा भाई, बूढ़े माँ बाप...

अपनी स्थितियों में समानता जान एक स्वाभाविक संवेदना ने उसके मन में जन्म लिया। गरीब आदमी है बेचारा, न जाने क्या खाया होगा सुबह से,न जाने कितनी सवारियां मिली होंगी, पुलिस वाले भी परेशान करते हैं, ऊपर से रस्ते में थोड़ी चढ़ाई भी है। इन्ही विचारों में डूबा हुआ था कि रिक्शे वाले की आवाज़ आई, "पहुँच गए साहब! "

उसने जेब से दस का नोट निकाला और रिक्शे वाले को दे दिया। वैसे पांच ही रूपये होते थे मगर संवेदना ने विस्तार हो जगह बढ़ा ली थी।

जाते -जाते उसने पूछा, "क्यों भाई क्या हुआ, रिक्शा नहीं चला पा रहे हो, कोई तकलीफ है क्या?"

"नहीं साहब थोड़ा नशा है, सुबह 'सोना' लिया था",उत्तर मिला।

"सोना ? यह क्या है?"

वह झुंझलाया, "अरे साहब आप क्या बोलते हैं उसको?", उसने नहर के बगल में उग रही झाड़ियों की तरफ इशारा करके कहा।

उसने पहले बार गौर से रिक्शे वाले की ओर देखा। उसकी आँखें आधी बंद थी। वह उन्हें खुला रखने की बहुत कोशिश कर रहा था। रिक्शे वाला भंग के नशे में लिप्त था।

खुद को ऐसे घूरा जाते हुए देख रिक्शे वाला कुछ घबराया। नशे ने उसके चेहरे के सभी भावों को दबा दिया था। बस एक बेचैनी,जैसे जल्दी से यह बातचीत ख़त्म कर भाग जाना चाहता हो।

उसे अफ़सोस हुआ कि उसने रिक्शे वाले को ज्यादा पैसे दिए। समस्त ब्रह्माण्ड कृति और उसके प्राणियों के प्रति उसका मन दुराभावों से भर चुका था। मन में पिछले १० मिनट के इस वाकिये को दुहराता हुआ वह घर की ओर बढ़ा।

(आगे जारी है ...)

रविवार, सितंबर 14, 2008

सिटी बस में दो महिलाएं - भाग दो

बस ने फ़िर से गति पकड़ ली थी। अपनी सफ़लता से उत्साहित होकर वो पुरूष गप्पियाने लगे। बस में बैठे लोग भी इस क्षणिक परिहास को मरुस्थल में जल की बूँद समझ उकता गए कुछ फ़िर से झोंके खाने लगे, तो दूसरों ने अखबार में नज़रें गढा लीं। लड़की भी इसे दैवगति समझ हताश भाव से बस के खंभे को ताकने लगी।

बस अगले स्टाप पर रुकी एक मोटी सी महिला लगी चढी। अधेड़ उम्र, सुनहरी साड़ी, आंखों पर काला धूप का चश्मा, कानों में बड़े रिंग, माथे पर औसत से कुछ बड़ी लाल रंग की बिंदी, कलाईयों में सोने के बड़े कंगन और पैरों में ऊँची हील। हाथों में बड़े थैले जिनमे शायद सेल से खरीदी गई साड़ी और सूट थे।

बस में ऊपर चढ़ने लगी तो दरवाज़े पे कुछ लड़के लटके हुए थे। ये लटकते हुए जीव भी अजीब नस्ल हैं। हर बड़े शहर चाहे दिल्ली हो या बंगलोर, कलकत्ता हो या मुंबई की बसों से लटकते मिल जायेंगे। शायद तेजी से बढती आबादी के सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है ये ! बस चाहे भरी हो या खाली ये जरूर दरवाजे पर लटकेंगे। किसी की नहीं सुनते कंडक्टर बेचारा रोज का कहता हुआ थक जाता है। स्टाप पर बस रुकते ही एक हुजूम आगे बढ़ता है ये लट्क्न्त जीव नीचे उतारते हैं सड़क पर थूकते हुए, आसपास गुजरती हुई लड़कियों को घूरते हैं। भीड़ के ऊपर चढ़ने का इंतजार करते हैं। फ़िर उसी हालत में एक हाथ बस के किसी कोने में फसांकर यूँही लटक जाते हैं। कोई मनोवैज्ञानिक होता तो जरूर इनको स्केपिस्ट जीव बताता!


खैर, उस महिला ने इन 'लट्क्न्त' जीवों की जम कर ख़बर ली। ऐसे डांट पिलाई कि लड़के भीगी बिल्ली बन गुपचुप रह गए। वैसे लड़के कुछ कम न थे पूरे दबंग! मगर उस महिला के डीलडौल और तेज आवाज से हुए इस गुरिल्ला अटैक' से भौंचक्के रह गए। न कुछ कहते बन पाया, न कुछ करते। चुपचाप ऊपर आ तो गए, मगर क्षण भर में ही अपने खोये हुए पौरुष का एह्साह हुआ। महिला आगे जा चुकी थी सो फ़िर से प्रत्यक्ष मुठभेड़ की संभावना को नकारते हुए फ़िर से आकर दरवाजे पर लटक गए।

गरीब कमजोर जनता को धकेलते हुए और कुछ बदनसीबों का पददमन करते हुए महिला रणभूमि में विजयी सेना की भांति रोंदते हुए आगे बढती जा रही थी। लगभग सभी सीट भरी हुई थी। तभी उसकी नज़र आगे की सीट पर पड़ी। महिला आरक्षित सीट पर विराजमान पुरूष !देखकर ही मन में सुगबुगाहट उठी। फ़िर बगल में सुकुचाई हुई, बस के खंभे को कसकर पकड़ी लड़की दिखाई दी। पल भर में ही सारा मांजरा उसकी समझ में आ गया।

कुलांचे मारते हुए सीट तक पहुँची और अंगार भरी निगाहों से उन पुरुषों की तरफ़ देखा। इस बार वे इस महिला की उपस्थिति को नकार न पाये। उसके जौहर वे पहले ही देख चुके थे सो ज्यादा हीलहुज्जत किए बिना ही उठ लिए। महिला मय बैग सीट पर धम्म से बैठी। लड़की को इशारा कर पास बुलाया और साथ में बिठा लिया।

उस लड़की के लिए यह एक नया पाठ था। उसने नज़रें उठा कर उन पुरुषों की तरफ़ देखा, जो खिसिया कर अब स्थानीय राजनीति पर बहस करने लगे थे। खिड़की से आती हुई बयार से पसीने के साथसाथ उसका संकोच भी हवा हो रहा था।

चित्र साभार: betta design (क्रिएटिव कॉमन लाइसेंस)

सिटी बस में दो महिलाएं - भाग 1

सिटी बस ठसाठस भरी हुई थी। जिधर देखो सर, हाथ, पैर ही दिखायी पड़ते थे! लोग इस कदर भरे हुए थे कि मालूम होता था मानो एक दडबे भर मुर्गियों को एक पिंजरे में ठूंस दिया गया हो। कहीं कोई कुहनी किसी कमर को गुदगुदा रही थी, तो कहीं कुछ पैर दूसरों पर विराजमान थे। कुछ लोग मय झोला- बैग सफर कर रहे थे- जिससे बस की रक्त वाहिनियों का संचरण अति संकुचित हो चुका था। इंजन की आवाज से लगता था मानो बस आंखिरी साँसे गिन रही हो।

आगे की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित रहती हैं। आज बस में महिलाओं की संख्या कम थी इसलिए कुछ पुरूष इस मौके का फायदा उठा कर कब्जा जमाये बैठे थे। तभी बस में एक नवयुवती चढी - लम्बी-दुबली सी, सकुचाई नजरों से इधर उधर देखती हुई आगे बढ़ी। लगता था ९ से ५ का अपना दफ्तर का कोटा पूरा करके आई थी। बस दुबारा चले हुए पाँच मिनट हो चुके थे। अब लड़की की जान में जान आई। पिछले पाँच मिनट से वह आसपास के वातावरण से अभिज्ञ सर झुकाए खड़ी थी। अब उसके चेहरे के भाव कुछ संयत हुए - उसने सर उठा कर चारों ओर नज़रें घुमाई, कुछ महिला आरक्षित सीट पर पुरूष बैठे थे।

उसके संकोची मन में कई विचार उठे लगे, कुछ अनिर्णीत पलों के बाद वह आगे बढ़ी और उस सीट के पास जाकर खड़ी हो गई। उसे लगा कि सीधे कह देना उचित न होगा, वहां बैठे पुरूष उसके लिए स्वतः सीट खली कर देंगे।


५ बजे कई दफ्तरों में छुट्टी हो जाते है। दिन भर से सर खपा कर लोग सीधे अपने घर, अपने परिवार के पास जाना चाहते हैं। बड़े शहरों में किसी को एक दूसरे से कोई मतलब नही, सब अपनी धुन में मस्त रहते हैं। यह कोई छोटा-मोटा क़स्बा नही कि आप भोजन के पश्चात् एक चक्कर काटने निकले तो आठ-दस पहचान वालों से दुआ सलाम हो गई। यह महानगर है ! यहाँ अपने पड़ोसी का परिचय प्राप्त किए बिना ही जिंदगी निकल जाती है।

वहां बैठे हुए पुरूष भी इस '९-५' नस्ल की उत्पत्ति थे - एकदम मोटी खाल! इस बात को ताड़ गए, निर्लज भावः से जम्हाई भरते हुए खिड़की से बाहर हवा खाने लगे। पूरे बस में बैठे लोगों की निगाहें उस लड़की पर थी। लड़की का चेहरा लज्जा से लाल था। सर झुकाए, वह पेरों के अंगूठे से कुरेदने का असफल प्रयास करने लगी। मन में रह -रह कर विचार उठ जाते थी - हाय क्यों मैंने ऐसे अपनी भद्द करवाई!

(आगे जारी...)

चित्र साभार: http://www.cepolina.com/

शनिवार, अगस्त 23, 2008

एक ट्रेन यात्रा

जेठ की भरी दुपहर! ट्रेन के अन्दर बैठे सभी मुसाफिर बेदम हैं। कमीज पसीने से गीली हो पीठ से चिपकी जा रही है। पहली बरसात में हर चप्पे पर फूट पड़ने वाले मशरूमों की तरह, गले में उग आई घमोरियों को खुजला - खुजला कर एक बच्चा परेशान था। उसकी माँ बीच - बीच में "एक के साथ दो मुफ्त" ब्रांड वाले पावडर को छिड़क देती थी। मगर कुछ ही समय में पसीना बरसाती नदियों की भांति उसे बहा ले जाता था। कुंठित होकर बच्चा अपने पैर पटकने लगता तो बगल में बैठे उसके पिता आँखे दिखने लगते। बच्चा आशा भरी नजरों से बार-बार खिड़कियों की तरफ़ देखता था। अभी कुछ समय पहले ही पिता ने खिड़की खोलने की कोशिश की थी। जरा सी जगह मिलते ही यूँ गरम हवा का झोंका अन्दर आया मानो गरम तवे पर हवा को सेका गया हो। तबसे खिड़कियाँ तो बॉर्डर की तरह सील की जा चुकी थी। जरा सा भी हलचल हुई तो गार्ड नुमा यात्री आँखें तरेरने लगते - जुर्रत है क्या?

माँ बच्चे का सर सहलानी लगी । ट्रेन चले हुए ३ घंटे तो हो ही चुके थे। इस बार गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर जायेंगे - इस प्रलोभन मात्र को मन में दबाये हुए बच्चा कुछ शांत था। नानी के घर पहुँच कर बर्फ वाला रूह अफजा और रसना मिलेगा - फ़िर नानी की गोद में बैठ कर रबडी वाली ठंडाई उडाई जायेगी! डेढ़ महीने तक पढ़ाई से छुट्टी और टीवी देखने की आजादी। फ़िर पिछली गर्मियों में बनाये हुए दोस्तों से भी तो मिलना है। ही मैन, सुपर कमांडो ध्रुव और न जाने कौनसे पोस्टर और स्टीकर इकठ्ठा किया हैं उसने - दोस्तों पर रोब ज़माने के लिए।

बच्चे की माँ भी सोच में थी - न जाने गुड्डी के रिश्ते का क्या हुआ? उसकी शादी के बाद बस छोटी बहिन गुड्डी की ही जिम्मेदारी रह गई थी। पिछले हफ्ते ही माँ ने ख़बर दी की एक लड़का देख कर गया है। लड़का तो अच्छा ही था - लाल बाज़ार वाले स्व. लाला रतनलाल जी प्रपोत्र है, ऊँचा खानदान , भरे बाज़ार में दुकान, तिमंजिला घर, परिवार के नाम पर बस एक छोटी बहिन - वो भी कुछ समय बाद विदा हो जायेगी। और माँ -बाप तो बस कब्र में पाँव लटकाए बैठे हैं। राज करेगी अपनी गुड्डी। वह घर जाकर माँ -पिता को समझायेगी कि ये वर हाथ से न जाने दें। जो भी देना दुआना है बस पूरा करो - लड़का हाथ से निकलना नही चाहिए।

राजू की पढ़ाई का भी न जाने क्या हुए। पिछले साल ही द्रितीय श्रेणी से बी. कॉम. किया है मगर नौकरी का कुछ पता नही। अभी घर के काम में हाथ बंटाता है। पिताजी की नौकरी और दो साल तक है - तो काम चल जाएगा। मगर जब घर में बहू आएगी तो क्या होगा?


इस बार इंदौर में आम की अच्छी फसल हुई है। पेड़ तो मानो लद गए हैं - दो बोरे अचारी आम ट्रेन की सीट के नीचे रखे हुए हैं। भोपाल जाकर अचार बनाया जायेगा - कुछ हाथ बंट जाएगा, यहाँ तो अकेले ये सब करने की हिम्मत ही नही है।

बच्चे के पिता शून्य में तांकते हुए सोच रहे हैं। वापस आकर छोटू का एड्मिशन नए अंग्रेज़ी स्कूल में करना है। आख़िर कब तक इस हिन्दी मध्यम बाल विद्या भारती विद्यालय में पढेगा? पिछले हफ्ते शर्माजी यूँ दफ्तर में बघिया रहे थे - उनके सुपुत्र को अंग्रेज़ी में पूरे पिचानवे 'मार्क्स' मिले हैं। जब भी घर जाओ तो छाती फुलाकर बेटे से 'बा - बा ब्लैक शीप' कविता का पाठ करवा देते हैं। मालुम होता है अँगरेज़ अपनी विरासत में से कुछ हिस्सा इनके नाम लिख गए हों! वैसे बात हो सही ही है - अंग्रेज़ी का बोलबाला है। कहीं कुछ काम नही होता इसके बिना।

लेकिन अंग्रेज़ी स्कूल की मोटी फीस का इंतज़ाम कहाँ से हो? यूँ ही तंगहाल हैं अब ये नए शोशे ! मगर शर्मा जी के उस गर्व भरे अट्ठाहस के सामने सब तर्क विफल थे। इस महंगाई के ज़माने में सरकारी नौकरी से क्या होता है - अब बोनस मिलने के बाद ही कुछ इंतज़ाम भी हो पायेगा। और हाँ, लालाजी को कहकर घर की छत भी सुधारवानी है। पिछली बरसात खत्म होने पर ही चूने लगी थी - और दीवारों की सीलन हो महीने भर बाद भी न गई थी। न जाने कब अपने घर में रहना नसीब होगा?

अचानक ट्रेन के झटके ने तंद्रा भंग की। ट्रेन की गति कम होती जा रही थी। दूर धुंधला सा भोपाल स्टेशन दिखाई पड़ रहा था। धूप भी कुछ मंद पड़ चुकी थी। खिड़कियाँ खोली गई - ताज़ी बयार ने पसीने से कुछ राहत दी। ढीली सी गति से होते हुए ट्रेन प्लेटफार्म पर जा लगी। खिड़की से बाहर झाँका तो सामने खड़ा राजू दिखाई दिया। झटपट आकर आम की दो बोरियां, सूटकेस और बैग ट्रेन से बाहर लाद दिए। फ़िर पैर छुए और गले मिला। पीछे और भी लोग इंतजार कर रहे थे। घर पहुँच कर सब पंखे के नीचे लधर गए। फ़िर बर्फ का ठंडा पानी मिला तो जान में जान आई। चारों और सब लोग खुश थे। छोटू नानी की गोद में खेलते हुए नई गेंद को सराह रहा था।

एक झोंके से सारा पसीना छू हो चुका था!

चित्र साभार: विकीमिडिया कॉमनस