पूर्वाग्रह मेरे चिंतन में सदा ही शामिल रहा है। न जाने क्यों मगर मैं सदा ही उससे मुग्ध रहा हूँ। मेरी कई प्रविष्टियाँ भी इस प्रसंग पर आधारित हैं। शायद इसलिए कि मेरा मन स्वयं पूर्वाग्रही हो! फ्रोय्डियन विश्लेषण भी इसी तरफ संकेत करता है - अवचेतन मन के विचार लेखनी में उतर आये हैं।
शायद वजह मेरे एक छोटे शहर से आकर एक महानगरीय संस्कृति में सम्मिलित होने की झिझक है। घर से निकलते हुए माता पिता ने कुछ ज्यादा ही मोटे रस्से पैरों में बाँध दिए थे। ये करना - वो नहीं, यहाँ जाना - वहां नहीं, इससे नहीं मिलना, चीज़ें संभल कर रखना वगैरह वगैरह। किसी दूसरे को देख कर पहले से विचार बना लेना, एक आलोचनात्मक रुख अपना लेना यह शायद उन्ही सीखों की देन है। शायद।
मगर क्या यह आचरण उन कुछ निर्धारक संलक्षणों में से नहीं है जो सिर्फ एक मानव का वैशिष्ठ्य है? आखिर सिक्के के दो पहलू ही तो हैं ये - अच्छाई और बुराई। आदि काल से मानव इतिहास पर नजर डालेंगे तो कई उदहारण मिल जायेंगे आपको। फिर मैं क्यों स्पष्टीकरण दूं अपने व्यवहार का?
२००५ में हॉलीवुड में एक फिल्म रिलीज़ हुई थी - Crash। यह फिल्म अमरीका में फैले सामाजिक,जातीय और रंगभेदीय संघर्षों के बारे में है। फिल्म में कई कहानियां सामानांतर चलती हैं जो कहीं न कहीं एक दूसरे से जुडी हुई हैं। कहानी के पात्र गोरे, काले, एशियन, लातिन अमरीकी और ईरानी हैं। मानसिक अंतर्द्वंदों से गुंथी हुई कहानी है ये। एक दूसरे के प्रति पूर्वधारणाओं और कुछ हद तक अज्ञान से उपजे अविश्वास की कहानी।
यह कहानी हमारे देश के किसी भी हिस्से की हो सकती है। बस रंग की जगह वर्ण,गोत्र,भाषा या ने ले ली है। दक्षिण भारतीय लुंगी धारी 'मद्रासी', भांगड़ा की ताल पर नाचते हुए पटियाला पैग गटकता पंजाबी, दिल्ली के 'अर्बन घेटो' में रहने वाला चिंकी, मुंबई महानगर पालिका की दीवार पर गुटके की पिचकारी मारता भैय्या, साल्ट लेक की कॉफ़ी शॉप में बहस करता भद्रलोक, दिल्ली के हाईवे ढाबों पर बर्तन धोता मासूम पहाड़ी बच्चा, रागिनी गुनगुनाते हुए १०० का नोट जेब में ठूंसने वाला हरियाणा पुलिस का सिपाही, रायपुर में बच्चों के लिए मिटटी के खिलौने बेचने वाला कोल, पश्चिमी घाट के किलों पर चढ़कर 'जय भारत' से पहले 'जय महाराष्ट्र' का नारा लगाने वाला मराठी या साथ में रसोइया लेकर चार धाम के दर्शन को जाने वाला शाकाहारी गुजराती।
वही नजर दौड़ाता हूँ तो दिखते हैं कुछ और रूप। सिख जिन्होंने 'अमृत' चखा है, IIT के सूट बूट पहने तमिल प्रोफ़ेसर, गुडगाँव के कॉल सेंटर में काम करते हुए अपनी पहचान खोता मणिपुरी, ट्रैफिक रोककर एक बूढ़े को सड़क पार करवाता दिल्ली पुलिस का सिपाही, सीमा पर देश के लिए गोली खाता मराठी मेजर, नारायणपुर में जवानों का गला काटता कोल, अहमदाबाद में दंगे करता गुजराती, मुंबई के अंडर वर्ल्ड का शार्प शूटर बन बैठा एक मासूम पहाड़ी बच्चा।
कौन है राम और कौन रावण? मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा - सर चकरा रहा है।
चित्र साभार : Francesco Marino
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मंगलवार, नवंबर 23, 2010
मंगलवार, जुलाई 27, 2010
३ इडियट्स
३ इडियट्स फिल्म बौलीवुड की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म है। ४५ करोड़ के बजट पर बनी यह फिल्म दुनिया भर में ४७० करोड़ रुपये की कमाई कर चुकी है। ऐसा करके आमिर खान ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सिनेमा दर्शकों की मनोवृति को वो कितनी अच्छी तरह समझ सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी इशारा किया कि आखिर असली इडियटस कौन हैं।

एक तरफ शाहरुख़ खान फिर से अपने हकले अवतार के साथ "माई नेम इज खान" जैसी बेहूदा फिल्म बना रहे हैं दूसरी तरफ अभिषेक बच्चन मुंह पर राख और मिटटी पोत,रावण बन अपनी ही बीवी का अपहरण कर खुद ही दिग्भ्रमित हैं। सैफ अली खान को "आई लव माई गर्लफ्रेंड" कहने से फुर्सत नहीं है। अमिताभ जी की उम्र काफी हो चुकी है - फिर भी वे अपने पोते की उम्र के लड़कों के साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं। सलमान खान तो खैर कंधे चौड़े किये अपनी ही टशन में रहते हैं,उन्हें बस यही डर है कि केटरीना रणबीर के साथ न भाग जाएँ। अर्जुन रामपाल को यह भ्रम हो गया है कि "रॉक ऑन" के बाद आख़िरकार वे एक अच्छे अभिनेता बन चुके हैं - यह आने वाले समय में जनता के लिए हानिकारक हो सकता है।

पिछले हफ्ते २५ जुलाई को यह फिल्म सोनी टीवी पर दिखाई गयी। ऐसा होने के बाद इस फिल्म ने एक रिकोर्ड और तोडा - टीवी पर सबसे ज्यादा कमाई करने का। इस फिल्म के ब्रेक के बीच में दिखाए जाने वाले विज्ञापन को २.२ लाख/सेकण्ड की दर से बेचा गया। इस फिल्म के टेलीकास्ट होने के २४ घंटे के अन्दर सोशिअल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर इसके लाइक्स ने एक छलांग लगे। यह है सोशिअल नेटवर्किंग का बढ़ता हुआ असर!

एक तरफ शाहरुख़ खान फिर से अपने हकले अवतार के साथ "माई नेम इज खान" जैसी बेहूदा फिल्म बना रहे हैं दूसरी तरफ अभिषेक बच्चन मुंह पर राख और मिटटी पोत,रावण बन अपनी ही बीवी का अपहरण कर खुद ही दिग्भ्रमित हैं। सैफ अली खान को "आई लव माई गर्लफ्रेंड" कहने से फुर्सत नहीं है। अमिताभ जी की उम्र काफी हो चुकी है - फिर भी वे अपने पोते की उम्र के लड़कों के साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं। सलमान खान तो खैर कंधे चौड़े किये अपनी ही टशन में रहते हैं,उन्हें बस यही डर है कि केटरीना रणबीर के साथ न भाग जाएँ। अर्जुन रामपाल को यह भ्रम हो गया है कि "रॉक ऑन" के बाद आख़िरकार वे एक अच्छे अभिनेता बन चुके हैं - यह आने वाले समय में जनता के लिए हानिकारक हो सकता है।

पिछले हफ्ते २५ जुलाई को यह फिल्म सोनी टीवी पर दिखाई गयी। ऐसा होने के बाद इस फिल्म ने एक रिकोर्ड और तोडा - टीवी पर सबसे ज्यादा कमाई करने का। इस फिल्म के ब्रेक के बीच में दिखाए जाने वाले विज्ञापन को २.२ लाख/सेकण्ड की दर से बेचा गया। इस फिल्म के टेलीकास्ट होने के २४ घंटे के अन्दर सोशिअल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर इसके लाइक्स ने एक छलांग लगे। यह है सोशिअल नेटवर्किंग का बढ़ता हुआ असर!
सोमवार, नवंबर 19, 2007
मेरे सपनों की लड़की ...
"लड़का और लड़की बस स्टॉप पर मिलते हैं. उनकी नज़रों का सामना होता है और आँखों ही आँखों मैं प्यार हो जाता है. कुछ ही देर में वो मग्न होकर पेड़ों के इर्द गिर्द चक्कर काटते हुए प्रेमगीत गाने लगते हैं. पीछे पृष्ठभूमि में कुछ भड़कीले कपड़े पहने हुए युवक - युवतियां ताल में ताल मिलकर नृत्य करना शुरू कर देती हैं." - थोड़े से फेरबदल के बाद यह सीन किसी भी बॉलीवुड फीचर फ़िल्म का हो सकता है .
आज हम आए बाये जब कोई हिन्दी फ़िल्म देखते हैं तो यही विचार मन में आता है कि आज की फिल्में यथार्थ से एकदम परे हो चली हैं. "उस मुई को देखो ,ऐसे कपड़े भी कोई पहनता है भला ?" , " इन साहब को देखिये न जाने किस आसमान में सवार हैं, भला ऐसे भी कोई किसी से बात करता है ?" और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं . कहने का अभिप्राय यह है कि हम सब अपनी समझ के हिसाब से परदे पर आने वाले हर पात्र का चीर फाड़ कर निष्कर्ष निकलते हैं कि "ये फ़िल्म वाले तो आजकल कुछ भी दिखाने लगे हैं !

मगर कहीं ऐसा तो नहीं कि हम उस रूमानियत की दुनिया को भूल चुके हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि अविश्वास का चश्मा नाक पर चढाये हम अति - यथार्थवादी हो चले हैं .ऐसी भूलें और बातें जो आज एक किरदार परदे पर कर रहा है कभी हमने भी की होंगी ! यदि ऐसा है तो इसमे बॉलीवुड के कथाकारों /निर्देशकों की गलती नहीं , वो तो बेचारे बस हमारे चश्मे पर चढी धूल की परत को साफ करने की कोशिश कर रहे हैं ! अगर उनकी कुछ गलती है तो सिर्फ़ ये कि वो अतिशयोक्ति के शिकार हो चले हैं.
अब यह पढिये....
एक जनाब की नज़रें न्यूयोर्क की भीड़-भाड़ वाली सबवे ट्रेन में एक बाला से टकरा गयीं - और फ़िर क्या था पहली नज़र में प्यार हो गया ! अब भीड़ इतनी कि वो लड़की उनकी आंखों से ओझल हो गई. बहुत ढूँढने पर भी जब इनको अपने ख्वाबों कि वो परी न मिली तो इन जनाब ने उसको ढूँढने के लिए एक वेबसाइट बना डाली! और देर सबेर इनको वो मिल भी गई - अब प्रेम कहानी का अंत क्या हुआ यह तो वही दोनों जाने मगर बात दिल को छू गई.
आज हम आए बाये जब कोई हिन्दी फ़िल्म देखते हैं तो यही विचार मन में आता है कि आज की फिल्में यथार्थ से एकदम परे हो चली हैं. "उस मुई को देखो ,ऐसे कपड़े भी कोई पहनता है भला ?" , " इन साहब को देखिये न जाने किस आसमान में सवार हैं, भला ऐसे भी कोई किसी से बात करता है ?" और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं . कहने का अभिप्राय यह है कि हम सब अपनी समझ के हिसाब से परदे पर आने वाले हर पात्र का चीर फाड़ कर निष्कर्ष निकलते हैं कि "ये फ़िल्म वाले तो आजकल कुछ भी दिखाने लगे हैं !

मगर कहीं ऐसा तो नहीं कि हम उस रूमानियत की दुनिया को भूल चुके हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि अविश्वास का चश्मा नाक पर चढाये हम अति - यथार्थवादी हो चले हैं .ऐसी भूलें और बातें जो आज एक किरदार परदे पर कर रहा है कभी हमने भी की होंगी ! यदि ऐसा है तो इसमे बॉलीवुड के कथाकारों /निर्देशकों की गलती नहीं , वो तो बेचारे बस हमारे चश्मे पर चढी धूल की परत को साफ करने की कोशिश कर रहे हैं ! अगर उनकी कुछ गलती है तो सिर्फ़ ये कि वो अतिशयोक्ति के शिकार हो चले हैं.
अब यह पढिये....
एक जनाब की नज़रें न्यूयोर्क की भीड़-भाड़ वाली सबवे ट्रेन में एक बाला से टकरा गयीं - और फ़िर क्या था पहली नज़र में प्यार हो गया ! अब भीड़ इतनी कि वो लड़की उनकी आंखों से ओझल हो गई. बहुत ढूँढने पर भी जब इनको अपने ख्वाबों कि वो परी न मिली तो इन जनाब ने उसको ढूँढने के लिए एक वेबसाइट बना डाली! और देर सबेर इनको वो मिल भी गई - अब प्रेम कहानी का अंत क्या हुआ यह तो वही दोनों जाने मगर बात दिल को छू गई.
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