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सोमवार, नवंबर 03, 2014

बड़े दिल वाले छोटे खां

अंग्रेजी में एक कहावत है - Truth is stranger than fiction - अर्थात सत्य कल्पना से भी ज्यादा विचित्र होता है। हम कई बार कहानियाँ पढ़ते हैं, फिल्में देखते हैं, दोस्तों से गपबाजी के किस्से सुनते हैं - अमुक किरदार ने ये किया, फलाने के साथ वो हुआ मगर फिर सोचते हैं यह सब तो सिर्फ कहानियों और किस्सों में , फ़िल्मी किरदारों के साथ ही होता है।

मैं एक बार पहले भी इस बारे में लिख चुका हूँ। यह दुनिया बड़ी अनोखी है - यहाँ क्या कुछ हो सकता है - इंसान क्या कुछ कर सकता है इस बात की कोई सीमा नहीं है। पिछले साल मैंने तीन भागों में एक छोटी सी कहानी लिखी थी - हज़ किश्त १ २ ३ । इस कहानी के मुख्य क़िरदार फ़ारुख़ सईद ने ताउम्र जमा किये गए हज के पैसे किसी दूसरे आदमी के इलाज के लिए दे दिए थे।

अभी कुछ दिन पहले एक समाचार देखा राजस्थान के कोटा में एक रिक्शा चलाने वाले छोटे खां ने हाड़ तोड़ मेहनत कर १२ साल में १ लाख रूपये जुटाए थे - यह सब पैसे उन्होंने बच्चों के हॉस्टल बनाने के लिए दान कर दिए। छोटे खां के अनुसार:

"मैंने सुना था कि बच्चों को शिक्षा देना ख़ुदा की इबादत से कम नहीं होता। हम हज करने लायक तो नहीं बचे, हॉस्टल का एक बच्चा भी क़ुरान पढ़ना सीख गया तो मैं समझूंगा कि मुझे हज का सबब मिल गया। "




छोटे खां साहब - आपके ज़ज्बे को सलाम !

चित्र साभार : दैनिक भास्कर

रविवार, अगस्त 04, 2013

दास्ताँ-ए-कॉमेडी

किन्ही जनाब ने कहा है - "आप किसी मुल्क के किरदार के बारे में अंदाज़ा लगाना चाहते हैं तो यह देखिये कि उस मुल्क के लोग किन चीज़ों पर हँसते हैं"

आज के ज़माने में आपको अगर अंदाज़ा लगाना है तो आपको किसी दूर मुल्क जाने की तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं है। सारी कायनात का इल्म आपकी मुट्ठी में हो सकता है बस जरा अँगुलियों को टपटपाने की हरकत करें! वैसे जरा अपने दामन पर नज़र डालें और देखें कि कॉमेडी के नाम पर क्या परोसा जा रहा है। लोग ठहाके मार हँस रहे है मुझे क्यूँ शर्मसार महसूस हो रहा है ये फिल्में और टीवी सीरियल देखकर?


मुनासिब शेर अर्ज है -

ख्वाहिश ए क़ल्ब है कि आज जी भर कर हँस लें
इन पर तो आसूँ भी बहाना ज़ाया है यारों।

मालूम है कि अभी नाउम्मीदी का माहौल है चारों तरफ,
पर क्या अब हँस भी नहीं सकते इन शोशों के बिना?

मुतब्बस्सिम है जहाँ ये तमाशा नज़र कर
अपनी तो ख़ुशी ने भी ख़ुदकुशी कर ली यारों।

Image Courtesy - Wikipedia (for non-profit use on the blog)


रविवार, सितंबर 09, 2012

गेंद

कुछ दिन पहले एक सहयोगी के सुपुत्र के जन्मदिवस पर जाना हुआ। वहीँ यह घटनाएं घटित हुई थी।

केक काटने की रीति से पहले माता पिता ने सगर्व पुत्र को सबके सामने प्रचारित किया। सोफे के पीछे से सर नीचे किये हुए एक "लिटिल मास्टर" प्रस्तुत हुए। गर्दन को चहुँ ओर चकराते और हाथ की उँगलियों को आपस में उलझाते हुए यह सुकुमार आगे बढे। अपने माता पिता के अनुसार उनके सुपुत्र विज्ञान, ज्यामित्री, खगोलशास्त्र और अंग्रेजी साहित्य में निपुण थे। नगर के सबसे महंगे कोचिंग इंस्टिट्यूट में वे अल्पायु से ही IIT के लिए तैयारी कर रहे थे।

पानी का क्वथनांक, ग्रहों का अनुक्रम, पाइथागोरस का सिद्धांत सब एक-एक कर उनकी जिव्हा पर अवतरित हुए। मर्चेंट ऑफ़ वेनिस से उद्धृत कर "हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती" ऐसा प्रमेय उन्होंने प्रदर्शित किया। युवा अवस्था में समाज के मूर्धन्य खंड बनने का भाव भी उस बालक ने प्रकट किया।

माता पिता फूल कर कुप्पा थे। माता इतने प्रतिभाशाली पुत्र को जन्मने पर खुद को बधाईपात्र मान रही थी और पिता सोच रहे थे कि पुत्र के उच्च सरकारी अफसर या नेता बनने पर उनके पास आने वाली सिफारिशों को वे कैसे संचलित करेंगे।

बच्चा संग साथियों को लेकर बाग़ में छुपकर आम चुराने की तरकीब बनाने वाला नटखट कम और Astroboy ज्यादा लग रहा था। बाकी विधाओं का तो पता नहीं मगर रट्टाशास्त्र में यक़ीनन पी एच डी करेंगे ऐसा मेरा मत था। बालपन में सरलता का ऐसा ह्रास देखकर मैं चिंतित था।


अब सब प्रस्तुतजन अपने-अपने बाल गोपाल की प्रतिभा का बखान करने लगे थे। अब तक बात ट्विंकल-ट्विंकल लिट्टिल स्टार, बा-बा ब्लैक शीप, जैक एंड जिल, जॉनी-जॉनी यस पापा से शुरू हो यत्र तत्र अन्यत्र पहुँच चुकी थी।

अंततोगत्वा यह प्रख्यान सम्पान हुआ और किन्ही कृपालु जन ने उन बाल से पूछा - " चलो यह सब सही रहा, अब बताओ तुम्हे क्या उपहार चाहिए?"

महफ़िल में सरसरी सी फ़ैल गयी। अरे इतना प्रतिभावान बालक है, क्या ही मांग बैठे? यह सोच सबके मन में थी। पीछे कुछ सज्जन "इन्सैक्लोपीडिया ब्रितानी" या "शेकस्पियर का संपूर्ण संकलन" पर शर्त लगा रहे थे।

बालक का चेहरा ख़ुशी से खिल उठा! कुछ संकुचाते, कुछ इठ्लाते हुए मुख पर रखे मुखौटे को मानो उतार, कृतज्ञ भाव से उसने कहा - "गेंद"।

आगे का कथानक जानने में रूचि न होते हुए मैंने तृप्त-सम्पुष्टित हो द्वार की ओर मुख किया।

नोट - यह रचना पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की लघुकथा "बालक बच गया" को समर्पित है।

चित्र साभार - http://www.freedigitalphotos.net/


मंगलवार, नवंबर 23, 2010

राम और रावण

पूर्वाग्रह मेरे चिंतन में सदा ही शामिल रहा है। न जाने क्यों मगर मैं सदा ही उससे मुग्ध रहा हूँ। मेरी कई प्रविष्टियाँ भी इस प्रसंग पर आधारित हैं। शायद इसलिए कि मेरा मन स्वयं पूर्वाग्रही हो! फ्रोय्डियन विश्लेषण भी इसी तरफ संकेत करता है - अवचेतन मन के विचार लेखनी में उतर आये हैं।

शायद वजह मेरे एक छोटे शहर से आकर एक महानगरीय संस्कृति में सम्मिलित होने की झिझक है। घर से निकलते हुए माता पिता ने कुछ ज्यादा ही मोटे रस्से पैरों में बाँध दिए थे। ये करना - वो नहीं, यहाँ जाना - वहां नहीं, इससे नहीं मिलना, चीज़ें संभल कर रखना वगैरह वगैरह। किसी दूसरे को देख कर पहले से विचार बना लेना, एक आलोचनात्मक रुख अपना लेना यह शायद उन्ही सीखों की देन है। शायद।

मगर क्या यह आचरण उन कुछ निर्धारक संलक्षणों में से नहीं है जो सिर्फ एक मानव का वैशिष्ठ्य है? आखिर सिक्के के दो पहलू ही तो हैं ये - अच्छाई और बुराई। आदि काल से मानव इतिहास पर नजर डालेंगे तो कई उदहारण मिल जायेंगे आपको। फिर मैं क्यों स्पष्टीकरण दूं अपने व्यवहार का?


२००५ में हॉलीवुड में एक फिल्म रिलीज़ हुई थी - Crash। यह फिल्म अमरीका में फैले सामाजिक,जातीय और रंगभेदीय संघर्षों के बारे में है। फिल्म में कई कहानियां सामानांतर चलती हैं जो कहीं न कहीं एक दूसरे से जुडी हुई हैं। कहानी के पात्र गोरे, काले, एशियन, लातिन अमरीकी और ईरानी हैं। मानसिक अंतर्द्वंदों से गुंथी हुई कहानी है ये। एक दूसरे के प्रति पूर्वधारणाओं और कुछ हद तक अज्ञान से उपजे अविश्वास की कहानी।

यह कहानी हमारे देश के किसी भी हिस्से की हो सकती है। बस रंग की जगह वर्ण,गोत्र,भाषा या ने ले ली है। दक्षिण भारतीय लुंगी धारी 'मद्रासी', भांगड़ा की ताल पर नाचते हुए पटियाला पैग गटकता पंजाबी, दिल्ली के 'अर्बन घेटो' में रहने वाला चिंकी, मुंबई महानगर पालिका की दीवार पर गुटके की पिचकारी मारता भैय्या, साल्ट लेक की कॉफ़ी शॉप में बहस करता भद्रलोक, दिल्ली के हाईवे ढाबों पर बर्तन धोता मासूम पहाड़ी बच्चा, रागिनी गुनगुनाते हुए १०० का नोट जेब में ठूंसने वाला हरियाणा पुलिस का सिपाही, रायपुर में बच्चों के लिए मिटटी के खिलौने बेचने वाला कोल, पश्चिमी घाट के किलों पर चढ़कर 'जय भारत' से पहले 'जय महाराष्ट्र' का नारा लगाने वाला मराठी या साथ में रसोइया लेकर चार धाम के दर्शन को जाने वाला शाकाहारी गुजराती।

वही नजर दौड़ाता हूँ तो दिखते हैं कुछ और रूप। सिख जिन्होंने 'अमृत' चखा है, IIT के सूट बूट पहने तमिल प्रोफ़ेसर, गुडगाँव के कॉल सेंटर में काम करते हुए अपनी पहचान खोता मणिपुरी, ट्रैफिक रोककर एक बूढ़े को सड़क पार करवाता दिल्ली पुलिस का सिपाही, सीमा पर देश के लिए गोली खाता मराठी मेजर, नारायणपुर में जवानों का गला काटता कोल, अहमदाबाद में दंगे करता गुजराती, मुंबई के अंडर वर्ल्ड का शार्प शूटर बन बैठा एक मासूम पहाड़ी बच्चा।

कौन है राम और कौन रावण? मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा - सर चकरा रहा है।

चित्र साभार : Francesco Marino

रविवार, सितंबर 14, 2008

सिटी बस में दो महिलाएं - भाग दो

बस ने फ़िर से गति पकड़ ली थी। अपनी सफ़लता से उत्साहित होकर वो पुरूष गप्पियाने लगे। बस में बैठे लोग भी इस क्षणिक परिहास को मरुस्थल में जल की बूँद समझ उकता गए कुछ फ़िर से झोंके खाने लगे, तो दूसरों ने अखबार में नज़रें गढा लीं। लड़की भी इसे दैवगति समझ हताश भाव से बस के खंभे को ताकने लगी।

बस अगले स्टाप पर रुकी एक मोटी सी महिला लगी चढी। अधेड़ उम्र, सुनहरी साड़ी, आंखों पर काला धूप का चश्मा, कानों में बड़े रिंग, माथे पर औसत से कुछ बड़ी लाल रंग की बिंदी, कलाईयों में सोने के बड़े कंगन और पैरों में ऊँची हील। हाथों में बड़े थैले जिनमे शायद सेल से खरीदी गई साड़ी और सूट थे।

बस में ऊपर चढ़ने लगी तो दरवाज़े पे कुछ लड़के लटके हुए थे। ये लटकते हुए जीव भी अजीब नस्ल हैं। हर बड़े शहर चाहे दिल्ली हो या बंगलोर, कलकत्ता हो या मुंबई की बसों से लटकते मिल जायेंगे। शायद तेजी से बढती आबादी के सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है ये ! बस चाहे भरी हो या खाली ये जरूर दरवाजे पर लटकेंगे। किसी की नहीं सुनते कंडक्टर बेचारा रोज का कहता हुआ थक जाता है। स्टाप पर बस रुकते ही एक हुजूम आगे बढ़ता है ये लट्क्न्त जीव नीचे उतारते हैं सड़क पर थूकते हुए, आसपास गुजरती हुई लड़कियों को घूरते हैं। भीड़ के ऊपर चढ़ने का इंतजार करते हैं। फ़िर उसी हालत में एक हाथ बस के किसी कोने में फसांकर यूँही लटक जाते हैं। कोई मनोवैज्ञानिक होता तो जरूर इनको स्केपिस्ट जीव बताता!


खैर, उस महिला ने इन 'लट्क्न्त' जीवों की जम कर ख़बर ली। ऐसे डांट पिलाई कि लड़के भीगी बिल्ली बन गुपचुप रह गए। वैसे लड़के कुछ कम न थे पूरे दबंग! मगर उस महिला के डीलडौल और तेज आवाज से हुए इस गुरिल्ला अटैक' से भौंचक्के रह गए। न कुछ कहते बन पाया, न कुछ करते। चुपचाप ऊपर आ तो गए, मगर क्षण भर में ही अपने खोये हुए पौरुष का एह्साह हुआ। महिला आगे जा चुकी थी सो फ़िर से प्रत्यक्ष मुठभेड़ की संभावना को नकारते हुए फ़िर से आकर दरवाजे पर लटक गए।

गरीब कमजोर जनता को धकेलते हुए और कुछ बदनसीबों का पददमन करते हुए महिला रणभूमि में विजयी सेना की भांति रोंदते हुए आगे बढती जा रही थी। लगभग सभी सीट भरी हुई थी। तभी उसकी नज़र आगे की सीट पर पड़ी। महिला आरक्षित सीट पर विराजमान पुरूष !देखकर ही मन में सुगबुगाहट उठी। फ़िर बगल में सुकुचाई हुई, बस के खंभे को कसकर पकड़ी लड़की दिखाई दी। पल भर में ही सारा मांजरा उसकी समझ में आ गया।

कुलांचे मारते हुए सीट तक पहुँची और अंगार भरी निगाहों से उन पुरुषों की तरफ़ देखा। इस बार वे इस महिला की उपस्थिति को नकार न पाये। उसके जौहर वे पहले ही देख चुके थे सो ज्यादा हीलहुज्जत किए बिना ही उठ लिए। महिला मय बैग सीट पर धम्म से बैठी। लड़की को इशारा कर पास बुलाया और साथ में बिठा लिया।

उस लड़की के लिए यह एक नया पाठ था। उसने नज़रें उठा कर उन पुरुषों की तरफ़ देखा, जो खिसिया कर अब स्थानीय राजनीति पर बहस करने लगे थे। खिड़की से आती हुई बयार से पसीने के साथसाथ उसका संकोच भी हवा हो रहा था।

चित्र साभार: betta design (क्रिएटिव कॉमन लाइसेंस)

सिटी बस में दो महिलाएं - भाग 1

सिटी बस ठसाठस भरी हुई थी। जिधर देखो सर, हाथ, पैर ही दिखायी पड़ते थे! लोग इस कदर भरे हुए थे कि मालूम होता था मानो एक दडबे भर मुर्गियों को एक पिंजरे में ठूंस दिया गया हो। कहीं कोई कुहनी किसी कमर को गुदगुदा रही थी, तो कहीं कुछ पैर दूसरों पर विराजमान थे। कुछ लोग मय झोला- बैग सफर कर रहे थे- जिससे बस की रक्त वाहिनियों का संचरण अति संकुचित हो चुका था। इंजन की आवाज से लगता था मानो बस आंखिरी साँसे गिन रही हो।

आगे की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित रहती हैं। आज बस में महिलाओं की संख्या कम थी इसलिए कुछ पुरूष इस मौके का फायदा उठा कर कब्जा जमाये बैठे थे। तभी बस में एक नवयुवती चढी - लम्बी-दुबली सी, सकुचाई नजरों से इधर उधर देखती हुई आगे बढ़ी। लगता था ९ से ५ का अपना दफ्तर का कोटा पूरा करके आई थी। बस दुबारा चले हुए पाँच मिनट हो चुके थे। अब लड़की की जान में जान आई। पिछले पाँच मिनट से वह आसपास के वातावरण से अभिज्ञ सर झुकाए खड़ी थी। अब उसके चेहरे के भाव कुछ संयत हुए - उसने सर उठा कर चारों ओर नज़रें घुमाई, कुछ महिला आरक्षित सीट पर पुरूष बैठे थे।

उसके संकोची मन में कई विचार उठे लगे, कुछ अनिर्णीत पलों के बाद वह आगे बढ़ी और उस सीट के पास जाकर खड़ी हो गई। उसे लगा कि सीधे कह देना उचित न होगा, वहां बैठे पुरूष उसके लिए स्वतः सीट खली कर देंगे।


५ बजे कई दफ्तरों में छुट्टी हो जाते है। दिन भर से सर खपा कर लोग सीधे अपने घर, अपने परिवार के पास जाना चाहते हैं। बड़े शहरों में किसी को एक दूसरे से कोई मतलब नही, सब अपनी धुन में मस्त रहते हैं। यह कोई छोटा-मोटा क़स्बा नही कि आप भोजन के पश्चात् एक चक्कर काटने निकले तो आठ-दस पहचान वालों से दुआ सलाम हो गई। यह महानगर है ! यहाँ अपने पड़ोसी का परिचय प्राप्त किए बिना ही जिंदगी निकल जाती है।

वहां बैठे हुए पुरूष भी इस '९-५' नस्ल की उत्पत्ति थे - एकदम मोटी खाल! इस बात को ताड़ गए, निर्लज भावः से जम्हाई भरते हुए खिड़की से बाहर हवा खाने लगे। पूरे बस में बैठे लोगों की निगाहें उस लड़की पर थी। लड़की का चेहरा लज्जा से लाल था। सर झुकाए, वह पेरों के अंगूठे से कुरेदने का असफल प्रयास करने लगी। मन में रह -रह कर विचार उठ जाते थी - हाय क्यों मैंने ऐसे अपनी भद्द करवाई!

(आगे जारी...)

चित्र साभार: http://www.cepolina.com/

सोमवार, अप्रैल 21, 2008

हाउ टू बी अ सोशियालायिट

Socialite - A socialite is a person (male or female, but more often used for a woman) of social prominence who spends significant resources entertaining and being entertained but is not (at least in the early 20th century heyday of socialites) a professional entertainer. A socialite is usually a member of the upper class or aristocracy with their social movements categorized in high-society magazines. - from Wikipedia.

मुझे पब्लिक ने कहा कि मैं सोशियल नहीं हूँ (इसका मतलब एंटी - सोशियल से न जोडा जाए )। घर पे गया तो पिताजी बोले ,"बेटा कुछ सोशियल बनो" - । "मुझे सोशियालिस्म से कुछ ख़ास लगाव नही है"- मैंने ऐसा टंग-इन-चीक कमेन्ट दिया तो वह आँखे दिखाने लगे। अब पिताजी को निबटा के साँस भरी ही थी कि फ्रेंड्स ने बिगुल बजा दिया - "अबे कैसा है तू ?", मैंने कहा, "मैं ऐसा ही हूँ"। काफ़ी समय तक उनको इग्नोर करने के आजकल मैं सोशियल बनने की कोशिश कर रहा हूँ।

वैसे सोशियलायिट होना भी एक कला ही है। इसके निदान के लिए "लाख दुखों की एक दवा" विकिपेडिया पर खोजा गया तो पता चला कि इसके लिए कुछ स्टेप्स हैं।

1. अच्छा नाम होना चाहिए। जैसे तारापोरवाला , सिंघानिया, मल्होत्रा, गोदरेज आदि अनादी। ज्यादा चूल हो तो क-अक्षरधारी किसी भी प्रदूषित धारावाहिक का अवलोकन किया जा सकता है - मगर अपने रिस्क पे। अब "लल्लन पाण्डेय" जैसे चिरकुटिया नाम का प्रयोग तो बिल्कुल ही अनफ़ैशनेबल है - अपने पैर पर कुल्हाडी मारने जैसा। हाँ, मिसेज पूनावाला एकदम "इन" नाम है।
2. लूक्स ऐसी हों कि लगे मानों राजघराने के वारिस आज अनाथालय में बक्शीश देने आए हों। यह न हो कि नाम हो लिल्लेटे दुबे और शकल हो हैदराबाद के लाद बाजार में चूडियाँ बेचने वाले सारखी।
3. आपका ग्रेजुएशन सही सब्जेक्ट से हो - जैसे इंग्लिश या फ्रेंच लिटरेचर , रोमन कला और साहित्य, साइकोलोजी या इकोनोमिक्स। हिन्दी साहित्य या राजनीती विज्ञान जैसे आत्मघाती शब्दों का प्रयोग तो कतई न करें। देहरादून या नैनीताल के बोर्डिंग स्कूलों में बचपन निकला हो तो सोने पे सुहागा!
4. आप कई सारे ट्रस्ट या कमिटी के सदस्य हों तो अच्छा होगा। हॉस्पिटल, चेरिटी, समाज के निम्न (गिरे हुए) वर्गों से संबंधित कुछ मिल जाए तो इमोशन का तड़का भी आ जाए। वैसे आजकल HIV - AIDS का बाज़ार भी काफ़ी गरम है।पूजनीय श्रीमती राधा बाई गंगवाल धर्मशाला का जिक्र नुकसानदायक हो सकता है।
5. शौक ऐसे पालें मानो नवाब के जाने हों! गोल्फ, पोलो,टेनिस, हौर्स रायडिंग, फार्मूला वन जैसे खेलो में रूचि रखें।गोल्फ क्लब की सदस्यता लें - किरकिट, हॉकी, कब्बडी जैसे सड़कछाप खेलों से दूर ही रहे। हाँ, IPL में रूचि दिखा सकते हैं।


6. गाल को चूमना सीखें - मगर भडैत तरीके से नहीं - बस हवा में एक किस। लंबा वाला सेशन पार्टी के बाद कार में पूरा कर सकते हैं।
7. होटल में समय बिताएं। एक रात के लिए कमरा लेकर दोस्तों को पार्टी पर बुलाएं - कह सकते हैं कि घर पे आप "बोर" हो गए थे - या फ़िर "यू नीडेड अ ब्रेक"। उपरोक्त उपाय प्रायतः काफी सफल पाया गया है।
8. चमकने वाले कपड़े पहने, जितनी चमक उतना असर ! लंदन और फ्रांस का लेबल हो तो बात बन जाए।
9. चेहरे पे सदा एक मुस्कान बनी रही - कैटरिना कैफ जैसी -(कमबख्त हर सीन में एक ही चेहरा ले के आ जातीहै)। एकदम ग्रेसफुल और नॉन-चलेंट रहें - दीन दुनिया से अविचलित। भले ही आपके सामने अभिषेक बच्चन खड़ा हो - यूं बिहेव करें कि मानों आपके लिए ये रोज की बात हो!
10. एंड लास्ट बात नेवर द लीस्ट - बात करने का लहजा सीखें। "यू लुक बियुटिफुल/गोर्जियस " के बजाय " यूलुक डिवायिन / डिवास्टेटिन्ग " बेहतर है। आप जो भी कहें वह एक्साइटिन्ग होना चाहिए - आम घरेलु काम को सजा -धजाकर बताएं।

अब मुझ जैसे देहाती - अनरिफ़ाइन्ड का न जाने क्या होगा मगर आप ही शायद इन तरीकों से लाभ उठा पाएं - इसी से मेरा लेख सार्थक हो जाएगा।

नोट - आज के इस भाषाई डायरिया के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। मगर क्या करूँ एक प्रोस्पेक्टिव सोशियालायिट को इसी भाषा का प्रयोग मान्य है!