मंगलवार, अगस्त 03, 2010

पूर्वाग्रह (लघु कथा) - भाग २

रिक्शे वाले की नशे से डूबी आँखें उसकी नज़रों के सामने घूम रही थी। वह आँखें खोलने का पूरा प्रयास कर रहा था - बीच में झुंझलाकर कह रहा था - "अरे साहब आप जानते नहीं इसे क्या कहते हैं? "

कई सवाल मन में गूँज रहे थे। मनुष्य मन विश्लेषणात्मक है - किसी भी परिस्थिति का जायजा लेकर खुद को ही समझाता है। "तेरी कोई गलती नहीं..ये लोग होते ही ऐसे हैं... आजकल भलाई का जमाना ही नहीं है .. वगैरह ..वगैरह"

अगर नशे में वह कहीं टक्कर मार देता तो? परिणामों की कल्पना के साथ ही उसका मन सिहर उठा। इस प्रश्न का कोई उत्तर मन के पास नहीं था। मानव मन भी कितना विकल है। कुछ क्षणों पहले ही वह रिक्शे वाले के काल्पनिक परिवार के साथ सहानुभूति जता रहा था और अभी उसी परिवार को मन से बहिष्कृत कर खुद को कोस रहा था। क्या वह प्रसंग एक क्षण की मानवीय दुर्बलता का द्योतक था?


इन्ही सवालों से उलझता हुआ वह नहर तक आ पहुंचा। आगे देखा कुछ मजदूर काम से वापस लौट रहे थे। सर पर धूल - मिटटी से मटमैला हो चुका कपड़ा बंधा था। गठीला-सुडौल बदन, चौड़े कंधे, मजबूत बाँहें। सफ़ेद कुरता और धोती, कंधे पर फावड़ा, हाथ में बीड़ी। मस्तक पर निकल आई पसीने की छोटी बूँदें संध्या की किरणों से झिलमिला कर यूँ कल्लोल कर रही थीं मानो दिन भर के कठिन परिश्रम के बाद प्राप्त हुए इस अल्प अनुग्रह से तृप्त हों।

बरसात के कारण नहर के दोनों तरफ झाड़ियाँ उग आई थीं। इन्ही झाड़ियों में कई भांग की भी थी। लम्बे हरे तने पर टिके सफ़ेद फूल मानो उसे मुंह चिड़ा रहे थे। अचानक एक आवाज आई - "अरे ओ दीनू जरा रुका हो...देखा हियाँ पे का है" - उन में से एक मजदूर पीछे रुक कर उन फूलों की तरफ इशारा कर बोल रहा था।

अशिक्षित गँवई मजदूर, देहाती भाषा और परवेश उसे कुछ पहचाना सा लगा - "देजा वू !" पिछले १५ मिनट की घटनाएं उसकी आँखों के सामने तांडव कर रही थीं। उसका मन घृणा से भर उठा - "ये लोग कभी नहीं सुधरेंगे!"

तभी उसे कुछ आवाजें उसके कान पर पड़ी - "अरे तुलसी ही है! देखो अम्मा कह रही थी, सावन का महिना लग रहा है..... अरे राम परसाद ... देखो जरा तुलसी की एक दो पौंध निकल लें"

कीचड में कमल को चरितार्थ करते हुए, उन भांग के सफ़ेद फूलों के बीच एक छोटा का तुलसी का पौंधा भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। कलियुग के दानवों ने अभी आर्यों का पूर्ण मर्दन न किया था।

चित्र साभार : विकिपीडिया

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर। तुलसी ऐसे ही उगा करेगी अब।

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  2. एक नया जोश एक नया वक़्त एक नया सवेरा लाना है
    कुछ नए लोग जो साथ रहे कुछ यार पुराने छूट गए
    अब नया दौर है नए मोड़ है नई खलिश है मंजिल की
    जाने इस जीवन दरिया के अब कितने साहिल फिसल गए

    अत्यंत खूबसूरत प्रस्तुति
    www.the-royal-salute.blogspot.com

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