बुधवार, जून 30, 2010

फुटबाल

आजकल फुटबाल की चहुँ ओर गूँज है, यहाँ तक कि महाबली क्रिकेट को कोई घास नहीं डाल रहा। वह भी हिंदुस्तान में - अक्षम्य अपराध! पिछले दिनों एशिया कप संपन्न हुआ मगर कोई खबर नहीं, कब आया और कब तशरीफ़ ले गया - उदय चोपड़ा की फिल्मों की भांति। इस बार तो भारत जीत भी गया - मगर कोई पूछ नहीं। एशिया कप का सीधा प्रसारण करने वाला चैनल तो अपना टीन टपेरा समेट चले। बड़बोले टीवी कमेन्टेटर अतिश्योक्ति अलंकार के बाणों की वर्षा असफल होने पर दंग थे।

कुछ अलग सा यह विश्व कप
वैसे यह विश्व कप कुछ अलग रहा है - पिछले फ़ाइनलिस्टस इटली और फ्रांस पहले ही राउंड में बाहर हो गए। मेजबान दक्षिण अफ्रीका भी दूसरे राउंड में नहीं पहुँच पाए - जो इस प्रतियोगिता के इतिहास में पहली बार हुआ है। ब्राजील हाल के वर्षों में अपनी सबसे कमज़ोर टीम होने के बावजूद भी दूसरी टीमों की धज्जियाँ उड़ा रहा है। जर्मनी अपने युवाओं के साथ इस प्रतियोगिता की सबसे बेहतर टीम रही है। वहीँ मुश्किल से इस विश्व कप के लिए अर्हता प्राप्त करने वाली अर्जन्टीना अपने अपारंपरिक प्रशिक्षक माराडोना के साथ काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही है। एक टांग पर इस प्रतियोगिता में पहुंची इंग्लैंड की टीम अपने उबाऊ प्रदर्शन, ख़राब किस्मत और घटिया रेफेरियिंग से बाहर हो गयी। वहीँ जहाँ अफ़्रीकी महाद्वीप में पहली बार विश्व कप होने पर अफ़्रीकी टीमों के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद लगाई जा रही थी वहां घाना के अलावा कोई टीम पहले दौर से आगे नहीं पहुँच पायी।


वुवुज़ेला
इस प्रतियोगिता का एक और वैशिष्ट्य रहे हैं तुरही रूप बाजे - वुवुज़ेला। लगभग दो फुट लम्बे ये बाजे पूरे मैच के दौरान मधुमक्खी रुपी बज्ज़ पैदा करते हैं। इनका काफी विरोध भी हो चुका है मगर फीफा ने इन पर प्रतिबन्ध लगाने से इनकार कर दिया। यहाँ तक की यू ट्यूब ने अपने कई लोकप्रिय वीडियो पर एक 'वुवुज़ेला' बटन भी लगाया है जिससे उन वीडियो के पीछे एक बज्ज़ ध्वनि पैदा होती है!


फिस्सड्डी भारत
वही भारतीय टीम के लुप्तप्राय होने के कारण मुझ जैसे कई भारतीयों को दूसरी टीमों का समर्थन करना पड़ता है। मेस्सी, काका, रोनाल्डो, रूनी जैसे खिलाडियों के नाम हमारी जुबान पर चढ़े हुए हैं। फुटबाल का समर्थन करना वैसे भी थोडा फेशनेबल है। वैसे मैं कोई बहुत बड़ा फुटबाल प्रशंसक या विशेषज्ञ नहीं हूँ। मैं भी उन बरसाती नदियों की तरह हूँ जिनमे वर्षा ऋतु प्राण फूंक देती है या फिर क्रिकेट रुपी कूप के निवासी वो मेंढक जो फुटबाल के अगाध समुद्र में हाथ पाँव मारने की कोशिश करते हैं।

एक बरसात और सही!

चित्र साभार : विकिपीडिया

रविवार, मई 23, 2010

शेरों को कैसे बचाएँ?

Save Tigers!

यह नारा आजकल काफी गूँज रहा है। और क्यों नहीं ! गूंजना भी चाहिए - शेर हमारे राष्ट्रीय जीव हैं। अमरीकी ईगल (गंजा गिद्ध कहना सही न होगा) , चीनी पांडा, आस्ट्रेलियन कंगारू - ये मात्र जानवर नहीं एक राष्ट्र प्रतीक हैं।

शेर को लेकर कुछ ज्यादा ही हल्ला गुल्ला है। एयरसेल, एनडीटीवी और WWF ने मिलकर देश के बाकी बचे १४११ शेरों को बचाने का जिम्मा उठाया है। (वैसे उन्होंने सौरव गांगुली को न चुनकर गलती की अन्यथा इस संख्या में एक का इजाफा हो सकता था) उनकी वेबसाईट कहती है कि शेरों को बचाने के लिए आप बहुत कुछ कर सकते हैं - इन्टरनेट पर चिल्ल पों (ब्लॉग, ट्वीट, फेसबुक, यू ट्यूब आदि अनादी), WWF जैसी संस्थाओं को दान, शेरों के बारे में जागरूकता बढ़ाना वगैरह - वगैरह।


मगर इन सब से क्या कोई सीधा फर्क क्या पड़ेगा? शेरों को सबसे बड़ा खतरा है अवैध शिकार से। आखिर पोचर्स WWF से सलाह मशविरा और ट्विटर पर अपना स्टेटस अपडेट करके तो शिकार करने जायेंगे नहीं! काजीरंगा नेशनल पार्क में शेरों का घनत्व विश्व में सबसे अधिक है - 32.64 प्रति १०० वर्ग किमी। अभी हाल ही में चार पोचर्स को वहां मारा गया है।

शेरों के अंगों से बनी दवाइयों की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में काफी मांग है - खासकर चीन में। ९ खरब रूपये प्रति वर्ष का बाज़ार है ये। क्या इन अंगों को प्रयोगशाला में तैयार नहीं किया जा सकता? यह खबर देखिये, 2006 की है - वैज्ञानिकों ने लैब में इंसान का गुर्दा तैयार किया और यहाँ २०१० की इस खबर में लैब में तैयार हुए साजोसामान से खरगोशों ने अपनी वंश वृद्धि भी कर ली!

तो क्या गैंडे के सींग, हाथियों के दांत, चिड़ियों के पंख, शेरों की हड्डियाँ, खाल और पंजे प्रयोगशाला में तैयार करके बाजार में नहीं उतारे जा सकते?

Image Credits: Wikipedia

रविवार, मई 16, 2010

जवाबी हलचल

हाल ही में आईपीएल के निलंबित आयुक्त और मोदीनगर के युवराज ललित कुमार मोदी ने बीसीसीआई के कारण बताओ नोटिस का जवाब दिया। उनकी ट्वीट के अनुसार १५,००० पन्नों का ये जवाब छह डब्बों में भरकर सौंपा गया। बीसीसीआई के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी रत्नाकर शेट्टी, जिन्होंने यह 'जवाब' ग्रहण किया, के अनुसार सभी सम्बंधित व्यक्तियों को इसकी एक प्रति प्रदान की जाएगी।

यह पूछे जाने पर कि इस बकासुरीय उत्तर को आत्मसात करने में काफी समय लगेगा, उनके वकील ने चुटकी लेते हुए कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि बीसीसीआई प्रमुख श्री शशांक मनोहर स्वयं एक वकील हैं जो एक मिनट में एक हज़ार पन्ने पढ़ लेते हैं। मोदी के वकील ने कहा कि उन्हें पूरा यकीन है कि श्रीमान मोदी के विरुद्ध लगाये गए सारे आरोप निराधार हैं और शीघ्रातिशीघ्र उन्हें पुनः स्थापित किया जायेगा।


ऐसा न होने पर उन्होंने एक और 'जवाब' भेजने की धमकी दी - इस बार ४५,००० पन्नों का। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अगली बार भी यह प्रलेख बीसीसीआई प्रमुख से ही पढ़वाया जायेगा। यह खबर पढ़ते ही शशांक मनोहर ने अगली सुबह एक प्रेस कान्फेरेंस बुला कर इस्तीफ़ा देने की धमकी दे दी। उनके अनुसार उनके वकील होने का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रेस कान्फेरेंस के दौरान उन्होंने कहा कि मोदी को हटाने में अरुण जेटली का हाथ था और चूँकि वे सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं इसलिए इन दस्तावेजों को पढने का दायित्व भी उनका है। ४५,००० पन्नों का जवाब आने की स्थिति में उन्होंने विदर्भ क्रिकेट असोसीएशन में वापस जाने की इच्छा जाहिर की।

एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक के युवा और जुझारू रिपोर्टर ने इस सवाल को श्री जेटली के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने देश में चल रही 'हीट वेव' का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे भीमशाली गट्ठों को तैयार करने में न जाने कितने पेड़ों को हलकान किया गया होगा। उन्होंने इन पुलिंदों को जनविरोधी करार देते हुए आम जनता से इसके विरुद्ध आवाज उठाने की हिमायत की। उनका कहना था की उनकी पार्टी इस मामले में राष्ट्र व्यापी आन्दोलन छेड़ेगी। उन्होंने अपने न्यायिक अनुभव का परिचय देते हुआ कहा कि वे इस मामले में संवेधानिक संशोधन लाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। १,००० पृष्ठों से ऊपर के दस्तावेजों के प्रकाशित होने की स्थिति में राष्ट्रपति की स्वीकृति परिहार्य होगी - ऐसा बिल वे संसद के ग्रीष्मकालीन सत्र में लायेंगे।

इसी दौरान निलंबित मंत्री श्री शशि थरूर का कहना है कि मोदी को बहाल किया जाना एक गलत उदहारण पेश करेगा। उन्होंने कहा केंद्र में मंत्री होने का उन्होंने कोई लाभ नहीं उठाया है - उल्टा उन्हें होटल से बाहर निकला गया और 'कैटल क्लास' में सफ़र करना पड़ा। जबकि दूसरी ओर मोदी अपने १३ लाख रूपये प्रति घंटे किराये वाले विमान का खर्चा भी आईपीएल से उठवा रहे हैं। यह सरासर नाइंसाफी है।

शनिवार, जून 20, 2009

साईकिल

उसने घर से साइकिल निकली और चल पड़ा। साइकिल के पूरे बदन पर धूल बिछी हुई थी। आजकल शहरों में कितनी धूल है, पता नही कहाँ से आ जाती है। विदेश में तो कहीं धूल नही होती? यहाँ वहां देखो धूल का एक कण भी नही दिखता और अपने ये शहर तो मानो धूल भरी तश्तरी है। जरा सी हवा चली नही कि चहुँ-ओर धूलमधूल। ये लोग पेड़ नही लगाते, घर पर घास का 'लॉन' उगाना प्रतिष्ठा का प्रतीक है, मगर मार्ग-विभाजक पर बिछी हुई घास का पद दमन करने में कोई हर्ज नही। देखा तो पहियों में हवा भी कुछ कम थी। पिछले दो हफ्तों से साइकिल जो न चलायी थी!

साइकिल का हेंडल पकड़ वह बाहर निकला। कल्लू पंक्चर की दुकान रस्ते में ही है - वहीँ हवा भरा लेगा। आगे जाकर एक शार्टकट मार सीधा हवा भरवाई। साइकिल पर कपड़ा मारा तो लगा कहीं से आहें और कहीं से दुआएं आई। स्टैंड पर टिकाकर पहियों को एक दो चक्कर घुमाये, गियर अपनी जगह पर स्थापित किए। आगे खाली सड़क थी - तो चल पड़ा।



शुरुआत में ही गति पकड़ ली, एक आध ऑटोरिक्शा को पीछे किया तो छाती फूल गई। कुछ ही देर में वह एक छुट्टन सी कार के बगल में था -दोनों साथ में - और अभी तो साइकिल पांचवे ही गियर में थी ! एक पल के लिए कार वाले को विश्वास न हुआ - झेंप कर उसने अपनी गति बढाई और धूल का गुबार उड़ाकर आगे निकल गया। मरा हाथी भी भैंस से ऊंचा होता है - भले ही छोटी हो, है तो कार ही !

फिजूल ही कार वाले के अहम् को ललकारा। ढेर सारी धूल फांक कार वह आगे बढ़ा - देखा तो चढाई थी। दो- तीन किलीमीटर तो हो ही गए होंगे - शुरू की गर्मी भी अब हवा हो चुकी थी। श्वसन गति भी बढ़ गई थी - तुंरत गियर डाउन किए, हाँफते हुए उस चढाई को पार किया।

कुछ देर बाद अब साँस सामान्य हो चुकी थी। उसे अपने अन्दर ऊर्जा का एक उमड़ता हुआ स्रोत महसूस हुआ। एक अनोखी खुशी और उन्माद की ऐसी अप्रतिम लहर - शायद इसी को 'Second Wind' कहते हैं।

रविवार, मई 31, 2009

दुनिया की सबसे कठिन भाषा?

मुझे नई भाषाएँ सीखने में रूचि है। कई सज्जनों ने पूछा, "क्यों?"। मन हुआ कि बडबडा दूँ "इन्टेलेक्चुअल क्युरिऔसिटी", मगर इन्टेलेक्चुअल को गटक गया और उगल दिया मात्र "क्युरिऔसिटी"। कई बार मन में प्रश्न उठता है कि "दुनिया की सबसे कठिन भाषा कौनसी है?"। वैसे यह प्रश्न यदि यूपी बोर्ड के छात्रों तो समक्ष रखा जाए तो सर्वसम्मत उत्तर मिलेगा - अंग्रेज़ी। यही देखकर उनके मन में अंग्रेजों के प्रति श्रद्धाभाव और बढ़ जाता है - वहां तो बच्चे भी अंग्रेज़ी बोल लेते हैं और यहाँ मैट्रिक पास होकर भी 'हेलो गुड मॉर्निंग और प्लीज़' से आगे नही बढ़ पाते!


वैसे यह प्रश्न भी बड़ा अजायब है, जिसका उत्तर इस बात पर निर्भर है कि उत्तर देने वाला कौन है! हिन्दीभाषी के लिए पंजाबी सीखना उसी तरह आसान है जैसे पुर्तगाली बोलने वाले के लिए स्पेनिश सीखना।अंग्रेज़ी में एक कहावत है "That's Greek to me" जिसका अपनी सीधी साधी खड़ी हिन्दी में अनुवाद है - "ये बात तो अपने पल्ले न पड़ी, सर के ऊपर से हो ली"गौरतलब बात यह है कि लगभग हर प्रमुख भाषा में इस कहावत का एक सदृश है। इन उदाहरणों पर एक नजर डालें तो कुछ दिलचस्प चीज़ें दिखाई देंगी। जैसे ब्रितानी लोगों के पल्ले ग्रीक, चीनी और डच भाषाएँ नही पड़ती तो फ्रांसीसियों के पल्ले हिब्रू और जावा। हमारी अपनी हिन्दी अरबों की समझ के बाहर है तो रो़म वासियों के लिए अरबी मंगल गृह पर बोली जाने वाली भाषा है। वैसे पंजाबी में भी कहते हैं " ਕੀ ਮੈਂ ਫਾਰਸੀ ਬੋਲ ਰਿਹੈਂ?" (क्या मैं फ़ारसी बोल रहा हूँ?)

अगर इन भाषाई मुहावरों को एक मानदंड मान कर यदि एक सर्वसम्मत निष्कर्ष निकला जाए तो वह यह होगा कि दुनिया की सबसे कठिन भाषा चीनी है। अब सीखने में सबसे मुश्किल भाषा बोलने वाले ये चीनी लोग किस भाषा को सबसे कठिन समझते हैं ? जंगल के राजा शेर को मात देने वाले को चुनौती देने का माद्दा किसमे है? चीनी भाषा के मुहावरों पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि चिडियों की भाषा ही अगला पायदान है। धन्य हो चीनियों!