Saturday, August 23, 2008

एक ट्रेन यात्रा

जेठ की भरी दुपहर! ट्रेन के अन्दर बैठे सभी मुसाफिर बेदम हैं। कमीज पसीने से गीली हो पीठ से चिपकी जा रही है। पहली बरसात में हर चप्पे पर फूट पड़ने वाले मशरूमों की तरह, गले में उग आई घमोरियों को खुजला - खुजला कर एक बच्चा परेशान था। उसकी माँ बीच - बीच में "एक के साथ दो मुफ्त" ब्रांड वाले पावडर को छिड़क देती थी। मगर कुछ ही समय में पसीना बरसाती नदियों की भांति उसे बहा ले जाता था। कुंठित होकर बच्चा अपने पैर पटकने लगता तो बगल में बैठे उसके पिता आँखे दिखने लगते। बच्चा आशा भरी नजरों से बार-बार खिड़कियों की तरफ़ देखता था। अभी कुछ समय पहले ही पिता ने खिड़की खोलने की कोशिश की थी। जरा सी जगह मिलते ही यूँ गरम हवा का झोंका अन्दर आया मानो गरम तवे पर हवा को सेका गया हो। तबसे खिड़कियाँ तो बॉर्डर की तरह सील की जा चुकी थी। जरा सा भी हलचल हुई तो गार्ड नुमा यात्री आँखें तरेरने लगते - जुर्रत है क्या?

माँ बच्चे का सर सहलानी लगी । ट्रेन चले हुए ३ घंटे तो हो ही चुके थे। इस बार गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर जायेंगे - इस प्रलोभन मात्र को मन में दबाये हुए बच्चा कुछ शांत था। नानी के घर पहुँच कर बर्फ वाला रूह अफजा और रसना मिलेगा - फ़िर नानी की गोद में बैठ कर रबडी वाली ठंडाई उडाई जायेगी! डेढ़ महीने तक पढ़ाई से छुट्टी और टीवी देखने की आजादी। फ़िर पिछली गर्मियों में बनाये हुए दोस्तों से भी तो मिलना है। ही मैन, सुपर कमांडो ध्रुव और न जाने कौनसे पोस्टर और स्टीकर इकठ्ठा किया हैं उसने - दोस्तों पर रोब ज़माने के लिए।

बच्चे की माँ भी सोच में थी - न जाने गुड्डी के रिश्ते का क्या हुआ? उसकी शादी के बाद बस छोटी बहिन गुड्डी की ही जिम्मेदारी रह गई थी। पिछले हफ्ते ही माँ ने ख़बर दी की एक लड़का देख कर गया है। लड़का तो अच्छा ही था - लाल बाज़ार वाले स्व. लाला रतनलाल जी प्रपोत्र है, ऊँचा खानदा, भरे बाज़ार में दुकान, तिमंजिला घर, परिवार के नाम पर बस एक छोटी बहिन - वो भी कुछ समय बाद विदा हो जायेगी। और माँ -बाप तो बस कब्र में पाँव लटकाए बैठे हैं। राज करेगी अपनी गुड्डी। वह घर जाकर माँ -पिता को समझायेगी कि ये वर हाथ से न जाने दें। जो भी देना दुआना है बस पूरा करो - लड़का हाथ से निकलना नही चाहिए।

राजू की पढ़ाई का भी न जाने क्या हुए। पिछले साल ही द्रितीय श्रेणी से बी. कॉम. किया है मगर नौकरी का कुछ पता नही। अभी घर के काम में हाथ बंटाता है। पिताजी की नौकरी और दो साल तक है - तो काम चल जाएगा। मगर जब घर में बहू आएगी तो क्या होगा?

इस बार इंदौर में आम की अच्छी फसल हुई है। पेड़ तो मानो लद गए हैं - दो बोरे अचारी आम ट्रेन की सीट के नीचे रखे हुए हैं। भोपाल जाकर अचार बनाया जायेगा - कुछ हाथ बंट जाएगा, यहाँ तो अकेले ये सब करने की हिम्मत ही नही है।

बच्चे के पिता शून्य में तांकते हुए सोच रहे हैं। वापस आकर छोटू का एड्मिशन नए अंग्रेज़ी स्कूल में करना है। आख़िर कब तक इस हिन्दी मध्यम बाल विद्या भारती विद्यालय में पढेगा? पिछले हफ्ते शर्माजी यूँ दफ्तर में बघिया रहे थे - उनके सुपुत्र को अंग्रेज़ी में पूरे पिचानवे 'मार्क्स' मिले हैं। जब भी घर जाओ तो छाती फुलाकर बेटे से 'बा - बा ब्लैक शीप' कविता का पाठ करवा देते हैं। मालुम होता है अँगरेज़ अपनी विरासत में से कुछ हिस्सा इनके नाम लिख गए हों! वैसे बात हो सही ही है - अंग्रेज़ी का बोलबाला है। कहीं कुछ काम नही होता इसके बिना।

लेकिन अंग्रेज़ी स्कूल की मोटी फीस का इंतज़ाम कहाँ से हो? यूँ ही तंगहाल हैं अब ये नए शोशे ! मगर शर्मा जी के उस गर्व भरे अट्ठाहस के सामने सब तर्क विफल थे। इस महंगाई के ज़माने में सरकारी नौकरी से क्या होता है - अब बोनस मिलने के बाद ही कुछ इंतज़ाम भी हो पायेगा। और हाँ, लालाजी को कहकर घर की छत भी सुधारवानी है। पिछली बरसात खत्म होने पर ही चूने लगी थी - और दीवारों की सीलन हो महीने भर बाद भी न गई थी। न जाने कब अपने घर में रहना नसीब होगा?

अचानक ट्रेन के झटके ने तंद्रा भंग की। ट्रेन की गति कम होती जा रही थी। दूर धुंधला सा भोपाल स्टेशन दिखाई पड़ रहा था। धूप भी कुछ मंद पड़ चुकी थी। खिड़कियाँ खोली गई - ताज़ी बयार ने पसीने से कुछ राहत दी। ढीली सी गति से होते हुए ट्रेन प्लेटफार्म पर जा लगी। खिड़की से बाहर झाँका तो सामने खड़ा राजू दिखाई दिया। झटपट आकर आम की दो बोरियां, सूटकेस और बैग ट्रेन से बाहर लाद दिए। फ़िर पैर छुए और गले मिला। पीछे और भी लोग इंतजार कर रहे थे। घर पहुँच कर सब पंखे के नीचे लधर गए। फ़िर बर्फ का ठंडा पानी मिला तो जान में जान आई। चारों और सब लोग खुश थे। छोटू नानी की गोद में खेलते हुए नई गेंद को सराह रहा था।

एक झोंके से सारा 'पसीना' छू हो चुका था।

4 comments:

Anil Pusadkar said...

bahut khoob.ek jhonke se sara pasina chhu ho gaya .kya baat hai.pehli bar padha aapko laga bar-bar padhun.badhai

Gyandutt Pandey said...

ये ल्लो। रेलवे में हूं और इस तरह की यात्रा बहुत अतीत में ठिल गयी है। अब तो स्टेशन पर विदा करने वाले बहुत से रेलकर्मी होते हैं और रास्ते में विण्डो-ट्रेलिंग निरीक्षण करते हम यह देखते जाते हैं कि ट्रेन धीमी क्यों चल रही है। ड्राइवर फुल बूस्टर पावर का प्रयोग क्यों नहीं कर रहा!

श्रीकांत पाराशर said...

behatrin rachana hai, koi sandeh nahin

Saurabh said...

आप सब महानुभावों की टिप्पणियों और उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद :)