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मंगलवार, जुलाई 27, 2010

३ इडियट्स

३ इडियट्स फिल्म बौलीवुड की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म है। ४५ करोड़ के बजट पर बनी यह फिल्म दुनिया भर में ४७० करोड़ रुपये की कमाई कर चुकी है। ऐसा करके आमिर खान ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सिनेमा दर्शकों की मनोवृति को वो कितनी अच्छी तरह समझ सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी इशारा किया कि आखिर असली इडियटस कौन हैं।


एक तरफ शाहरुख़ खान फिर से अपने हकले अवतार के साथ "माई नेम इज खान" जैसी बेहूदा फिल्म बना रहे हैं दूसरी तरफ अभिषेक बच्चन मुंह पर राख और मिटटी पोत,रावण बन अपनी ही बीवी का अपहरण कर खुद ही दिग्भ्रमित हैं। सैफ अली खान को "आई लव माई गर्लफ्रेंड" कहने से फुर्सत नहीं है। अमिताभ जी की उम्र काफी हो चुकी है - फिर भी वे अपने पोते की उम्र के लड़कों के साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं। सलमान खान तो खैर कंधे चौड़े किये अपनी ही टशन में रहते हैं,उन्हें बस यही डर है कि केटरीना रणबीर के साथ न भाग जाएँ। अर्जुन रामपाल को यह भ्रम हो गया है कि "रॉक ऑन" के बाद आख़िरकार वे एक अच्छे अभिनेता बन चुके हैं - यह आने वाले समय में जनता के लिए हानिकारक हो सकता है।


पिछले हफ्ते २५ जुलाई को यह फिल्म सोनी टीवी पर दिखाई गयी। ऐसा होने के बाद इस फिल्म ने एक रिकोर्ड और तोडा - टीवी पर सबसे ज्यादा कमाई करने का। इस फिल्म के ब्रेक के बीच में दिखाए जाने वाले विज्ञापन को २.२ लाख/सेकण्ड की दर से बेचा गया। इस फिल्म के टेलीकास्ट होने के २४ घंटे के अन्दर सोशिअल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर इसके लाइक्स ने एक छलांग लगे। यह है सोशिअल नेटवर्किंग का बढ़ता हुआ असर!

शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

दास्ताँ ऐ जायका

मुझे खाना बनाना पसंद है। वैसे सही कहा जाये तो खाना बनाना नहीं वरन खाना बनाते हुए प्रयोग करना पसंद है। एक दिन कहीं पढ़ा कि सब्जी में पड़ने वाले मसाले प्राकृतिक होने के कारण उन्हें पकाना नहीं चाहिए, सिर्फ ऊपर से डालना चाहिए। उस रात बनी सब्जी कूड़ेदान में दो दिन तक सड़ती रही। एक दिन गरम दूध में केले डाल दिए तो दूध फट गया। कभी दही, कभी नींबू, कभी अचार मसाला डाल कर सब्जी को ख़राब किया। अनुसंधान के नाम पर कई बार खाने में तला लगा।

बारिश के मौसम में चाय-पकोड़े खाने के लालच में पकोड़े तेल में जलाकर काले किये और लेमन टी बनाने के चक्कर में फटे दूध की चाय बनाई। दीवाली में पटाखे तो सभी फोड़ते हैं मगर मैंने तेल भरी कढ़ाई में समोसे फोड़े। दक्षिण भारतीय पाक शैली से प्रभावित हो एक रविवार डोसा मसाला पावडर खरीदा तो पूरी छुट्टी उस तवे को साफ़ करने में निकली, भूखे पेट रहे सो अलग। कभी ज्यादा पानी से चावल की खीर बन गयी तो कभी कम पानी की वजह से कुकर फटते - फटते बचा। ऑस्ट्रेलिया के मानचित्र का चिंतन करते हुए बनाई गयी रोटी अफ्रीका का अनुसरण करने लगी। कच्चे पपीते की सब्जी खाने के बाद एक हफ्ते पेट दर्द रहा। मगर हम भी हार मानने वालों में से कहाँ थे!



तय हुआ कि टीवी पर "कुकरी शो" देखे जाएँ। क्या पता चौपिंग पैड पर सर रगड़कर अपनी जड़मति भी सुजान हो जाए? मगर आजकल टीवी पर कुकरी कम और खुखरी शो ज्यादा लोकप्रिय हैं। जैसे तैसे संजीव कपूर के शो खाना खज़ाना को ढूँढा गया। एक पल के लिए लगा कि खाना बनाना कितना आसान है।

देखिये कितने सुन्दर चाइना की तश्तरियों में सलीके से छल्लेदार सब्जियां काट कर रखी हैं। छोटे छोटे प्यालों में जायफल, दालचीनी, इलाइची, जाफरानी केसर, चक्र फूल और न जाने कौन - कौन से अजूबे मोहक पदार्थ रखे हुए हैं। दूसरी तरफ चीनी मिटटी के सफ़ेद कटोरों में नमक, हल्दी, मिर्च, धनिया, हींग, अदरक और लहसुन भी आत्मसंतुष्टि से भरे हुए हैं। जैतून का तेल सुराही नुमा जग में बैठा बाकी सब को यूँ देख रहा है जैसी बाढ़ ग्रस्त इलाके को हेलीकाप्टर पर बैठा मंत्री। सारे बर्तन एकदम साफ़ सुथरे और चमकते हुए, जैसे १५ अगस्त की प्रभात फेरी के लिए तैयार स्कूल के बच्चे।

ऐसा लगता है जैसे बोरीवली में फिल्माए जा रहे एक सीन से कैमरा एक पल के लिए स्विट्ज़रलैंड की हसीन वादियों में पहुँच गया हो। सब कुछ इतना सरल, सहज, सुन्दर और सुगम। बस सब्जियां कटी हों, तेल गरम हो, मसाले पिसे हों - सब्जी डालो और पकाओ - न सब्जी काटने की समस्या, न बर्तन धोने का टेंशन! मन हुआ कि ऐसे ही किसी टीवी शो में भर्ती हुआ जाये, इसी बहाने रोज अच्छे पकवान खाने को मिलेंगे।

खैर लौट के बुद्धू घर को आये। समझ में आया कि यह अपने बस का रोग नहीं - जिस का काम उसी को साजे, और करे तो डंडा बाजे। उस दिन से आज तक अपनी पाक प्रतिभा मैगी बनाने तक ही सीमित है।

चित्र साभार : विकिपीडिया

सोमवार, नवंबर 19, 2007

मेरे सपनों की लड़की ...

"लड़का और लड़की बस स्टॉप पर मिलते हैं. उनकी नज़रों का सामना होता है और आँखों ही आँखों मैं प्यार हो जाता है. कुछ ही देर में वो मग्न होकर पेड़ों के इर्द गिर्द चक्कर काटते हुए प्रेमगीत गाने लगते हैं. पीछे पृष्ठभूमि में कुछ भड़कीले कपड़े पहने हुए युवक - युवतियां ताल में ताल मिलकर नृत्य करना शुरू कर देती हैं." - थोड़े से फेरबदल के बाद यह सीन किसी भी बॉलीवुड फीचर फ़िल्म का हो सकता है .

आज हम आए बाये जब कोई हिन्दी फ़िल्म देखते हैं तो यही विचार मन में आता है कि आज की फिल्में यथार्थ से एकदम परे हो चली हैं. "उस मुई को देखो ,ऐसे कपड़े भी कोई पहनता है भला ?" , " इन साहब को देखिये जाने किस आसमान में सवार हैं, भला ऐसे भी कोई किसी से बात करता है ?" और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं . कहने का अभिप्राय यह है कि हम सब अपनी समझ के हिसाब से परदे पर आने वाले हर पात्र का चीर फाड़ कर निष्कर्ष निकलते हैं कि "ये फ़िल्म वाले तो आजकल कुछ भी दिखाने लगे हैं !


मगर कहीं ऐसा तो नहीं कि हम उस रूमानियत की दुनिया को भूल चुके हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि अविश्वास का चश्मा नाक पर चढाये हम अति - यथार्थवादी हो चले हैं .ऐसी भूलें और बातें जो आज एक किरदार परदे पर कर रहा है कभी हमने भी की होंगी ! यदि ऐसा है तो इसमे बॉलीवुड के कथाकारों /निर्देशकों की गलती नहीं , वो तो बेचारे बस हमारे चश्मे पर चढी धूल की परत को साफ करने की कोशिश कर रहे हैं ! अगर उनकी कुछ गलती है तो सिर्फ़ ये कि वो अतिशयोक्ति के शिकार हो चले हैं.


अब यह पढिये....
एक जनाब की नज़रें न्यूयोर्क की भीड़-भाड़ वाली सबवे ट्रेन में एक बाला से टकरा गयीं - और फ़िर क्या था पहली नज़र में प्यार हो गया ! अब भीड़ इतनी कि वो लड़की उनकी आंखों से ओझल हो गई. बहुत ढूँढने पर भी जब इनको अपने ख्वाबों कि वो परी न मिली तो इन जनाब ने उसको ढूँढने के लिए एक वेबसाइट बना डाली! और देर सबेर इनको वो मिल भी गई - अब प्रेम कहानी का अंत क्या हुआ यह तो वही दोनों जाने मगर बात दिल को छू गई.